मथुरा।छाता विधानसभा की राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। भाजपा-रालोद गठबंधन के बीच सीट बंटवारे को लेकर भले ही अभी कोई आधिकारिक घोषणा न हुई हो, लेकिन क्षेत्र में दो बड़े नाम लगातार चर्चा के केंद्र में हैं। एक तरफ प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी हैं, तो दूसरी तरफ रालोद के वरिष्ठ नेता ठाकुर तेजपाल सिंह।दिलचस्प बात यह है कि दोनों नेता गठबंधन के ऐसे समीकरण में बंधे हुए हैं, जहां खुलकर राजनीतिक आक्रामकता दिखाना आसान नहीं है। किसी बड़े मुद्दे या विवाद पर तेजपाल सिंह विपक्षी तेवर अपनाना चाहते हैं, लेकिन गठबंधन की मर्यादाएं उन्हें संभलकर बोलने के लिए मजबूर कर देती हैं। हाल ही में बरसाना प्रकरण के दौरान भी उनका रुख इसी संतुलन का उदाहरण माना गया।दूसरी ओर, तेजपाल सिंह लगातार यह दावा करते रहे हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव में छाता सीट रालोद के खाते में आएगी और वे ही पार्टी के उम्मीदवार होंगे। रालोद नेतृत्व की ओर से भी समय-समय पर ऐसे संकेत दिए गए हैं, हालांकि अंतिम फैसला अभी बाकी है।

उधर, लक्ष्मी नारायण चौधरी भी पहले गठबंधन को लेकर अपनी स्पष्ट राय जाहिर कर चुके हैं। उनका वह बयान काफी चर्चाओं में रहा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि रालोद के साथ गठबंधन से भाजपा को नुकसान हुआ है। इस बयान पर राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा हुई और पार्टी नेतृत्व की नाराजगी की खबरें भी सामने आई थीं। हालांकि बाद में मामला शांत हो गया।राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में छाता विधानसभा की सबसे बड़ी पहेली यह है कि अब तक इन दोनों नेताओं के अलावा कोई तीसरा मजबूत दावेदार प्रभावी रूप से सामने नहीं आया है। ऐसे में चुनावी मुकाबला फिलहाल इन्हीं दो चेहरों के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है।
यदि भविष्य में यह सीट भाजपा के खाते में जाती है, तो तेजपाल सिंह के सामने राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है। गठबंधन की स्थिति में उनके लिए बिना अधिकृत चुनाव चिन्ह के मैदान में उतरना आसान नहीं होगा। वहीं, ऐसी स्थिति में लक्ष्मी नारायण चौधरी का पलड़ा अपेक्षाकृत भारी दिखाई दे सकता है, भले ही वे लंबे समय से सत्ता में रहने के कारण एंटी-इनकम्बेंसी का सामना कर रहे हों।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि छाता की राजनीति में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चुनाव से पहले सभी समीकरण तय हो चुके हैं या फिर आने वाले समय में कोई नया चेहरा भी उभरकर सामने आएगा। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मतदाताओं के पास अधिक विकल्प होना हमेशा बेहतर माना जाता है। ऐसे में क्षेत्र की जनता भी आने वाले दिनों में राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है।फिलहाल इतना तय है कि छाता विधानसभा में एक सीट पर दो मजबूत दावेदार नजर आ रहे हैं, लेकिन अंतिम फैसला गठबंधन नेतृत्व के हाथ में है। जब तक सीट बंटवारे की तस्वीर साफ नहीं होती, तब तक राजनीतिक अटकलों का दौर जारी रहने वाला है।





















