जिला नजर वैश्विक उथल-पुथल के इस दौर में जब युद्ध की आंच दूर देशों से उठकर विश्वव्यापी अस्थिरता का कारण बन रही है, तब भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती केवल बाहरी संकट नहीं, बल्कि आंतरिक नैतिक संतुलन की भी है। दुर्भाग्यवश, समाज में नैतिकता और सदाचार के क्षरण ने जमाखोरी और कालाबाजारी जैसी प्रवृत्तियों को जन्म दिया है, जो किसी भी संकट को और अधिक विकराल बना देती हैं।
यह विडंबना ही है कि जिस युद्ध से भारत प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित नहीं है, उसके नाम पर देश के भीतर भय और असंतुलन का वातावरण निर्मित किया जा रहा है। ऊर्जा संकट की आशंका ने अफवाहों को जन्म दिया और इन अफवाहों ने आमजन के मन में अनावश्यक पैनिक भर दिया। परिणामस्वरूप, जिन परिवारों के पास पर्याप्त संसाधन हैं, वे भी अंधाधुंध संग्रह में जुट गए। यह आचरण न केवल सामाजिक असंतुलन को बढ़ाता है, बल्कि वास्तविक जरूरतमंदों के अधिकारों का भी हनन करता है।
सरकार अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ बनाए रखने और कालाबाजारियों पर अंकुश लगाने के लिए सतत प्रयासरत है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत ने अपनी कूटनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए नए ऊर्जा स्रोतों की तलाश और वैश्विक सहयोग को प्राथमिकता दी है। किंतु केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हो सकते।
समय की मांग है कि नागरिक भी अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें। संकट के समय संयम, सहयोग और विश्वास ही समाज को स्थिरता प्रदान करते हैं। यदि प्रत्येक नागरिक अपने उत्तरदायित्व को समझे, तो कोई भी संकट राष्ट्र की शक्ति को कमजोर नहीं कर सकता। यही वह क्षण है, जब कर्तव्यबोध को जागृत कर हम एक सशक्त और संतुलित समाज की स्थापना कर सकते हैं।























