आगरा। महिला आरक्षण को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर तीखी हो गई है। एक तरफ नेता संसद और मंचों से महिलाओं के अधिकारों की वकालत करते नहीं थकते, वहीं दूसरी तरफ अब उन्हीं पर सवालों की बौछार शुरू हो गई है। ताजा बयान में राजनीतिक दलों पर सीधा हमला करते हुए कहा गया है कि “महिला आरक्षण पर छाती पीटने वाले पहले अपने गिरेबान में झांकें।”
यह सवाल उठाया गया कि आखिर पार्टियों के अंदर, बूथ स्तर से लेकर केंद्रीय कार्यकारिणी तक, महिलाओं को कितनी वास्तविक भागीदारी दी गई है? क्या सिर्फ कानून बनाना ही पर्याप्त है, या फिर राजनीतिक दलों को खुद भी अपने संगठन में महिलाओं को बराबरी का हक देना चाहिए?
आरोप है कि कई पार्टियां महिला आरक्षण के नाम पर सिर्फ घड़ियाली आंसू बहा रही हैं, जबकि हकीकत में उनके संगठन में महिलाओं की भागीदारी बेहद सीमित है। इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है और अब पार्टियों पर दबाव बढ़ता नजर आ रहा है कि वे अपनी आंतरिक संरचना में पारदर्शिता लाएं।
महिला सशक्तिकरण की असली परीक्षा अब संसद के बाहर, राजनीतिक दलों के भीतर शुरू होनी है।























