“जल ही जीवन है”—यह वाक्य अब केवल पाठ्यपुस्तकों की पंक्ति बनकर रह जाए, उससे पहले हमें अपनी सोच और व्यवहार दोनों में परिवर्तन लाना होगा। क्योंकि सच्चाई यह है कि जल का संकट अब भविष्य की आशंका नहीं, वर्तमान की कठोर वास्तविकता बन चुका है। ऐसे में “जल बिन जीवन कैसा” का प्रश्न केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल बन गया है।
सरकार द्वारा चलाई जा रही जल जीवन मिशन जैसी योजनाएं निश्चित ही सराहनीय प्रयास हैं, लेकिन इनकी सफलता तभी मानी जाएगी जब हर घर तक पहुंचने वाला पानी वास्तव में स्वच्छ और सुरक्षित हो। दुर्भाग्यवश, वर्तमान स्थिति इस आदर्श से काफी दूर दिखाई देती है। विभिन्न राज्यों में लिए गए पेयजल नमूनों की जांच बताती है कि बड़ी मात्रा में जल आज भी प्रदूषित है, और उससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि उनमें से बहुत कम को शुद्ध करने के प्रभावी प्रयास किए जाते हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि विकास के दावों पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
समस्या केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। शहरीकरण की अंधी दौड़ ने महानगरों को भी जल संकट के दलदल में धकेल दिया है। जर्जर पाइपलाइन, अव्यवस्थित सीवेज प्रणाली और बढ़ते औद्योगिक अपशिष्ट ने जल स्रोतों को गंभीर रूप से दूषित कर दिया है। कई स्थानों पर पेयजल और सीवर लाइन की निकटता एक घातक मिश्रण तैयार कर रही है, जिसका परिणाम लोगों की बीमारियों और असमय मृत्यु के रूप में सामने आ रहा है। इंदौर जैसे स्वच्छता में अग्रणी शहरों में भी दूषित जल से मौतें होना इस विडंबना का सजीव उदाहरण है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि अधिकांश बीमारियों की जड़ दूषित जल है। हैजा, टाइफाइड, पीलिया जैसी बीमारियां आज भी हमारे समाज को जकड़े हुए हैं, जिनका सबसे अधिक असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है। यह केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा का भी प्रश्न है।
जल प्रदूषण के पीछे औद्योगिक कचरा, अनुपचारित सीवेज और भूजल का अंधाधुंध दोहन प्रमुख कारण हैं। नदियां, जो कभी जीवनदायिनी मानी जाती थीं, आज प्रदूषण की मार झेल रही हैं। इसके साथ ही, पारिस्थितिकी तंत्र भी गंभीर संकट में है, जिसका प्रभाव अंततः मानव जीवन पर ही पड़ता है।
समाधान स्पष्ट है—जल प्रबंधन को सरकारी दायरे से निकालकर जनआंदोलन बनाना होगा। नियमित जल जांच, पुरानी पाइपलाइनों का नवीनीकरण, औद्योगिक कचरे पर कठोर नियंत्रण और स्थानीय निकायों की जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की मांग है।
अंततः, जल की रक्षा ही जीवन की रक्षा है। यदि अब भी हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। अब वक्त है—सोच बदलने का, क्योंकि जल बचेगा तभी कल बचेगा।























