भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। तमिलनाडु में हिंदी को लेकर छिड़ा विवाद एक बार फिर साबित करता है कि भाषाई राजनीति कितनी संवेदनशील हो सकती है। केंद्रीय राज्य मंत्री एल. मुरुगन ने बुधवार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि केंद्र सरकार ने कभी किसी राज्य पर हिंदी थोपी नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का श्रेय देते हुए बताया कि उनके सत्ता संभालने के बाद अर्धसैनिक भर्ती परीक्षाएं तमिल में आयोजित करने की अनुमति मिली, जिससे तमिल उम्मीदवारों को अभूतपूर्व अवसर प्राप्त हुए। मुरुगन ने तमिल भाषा को विश्व पटल पर गौरवान्वित करने का उल्लेख किया, जहां तिरुक्कुरल का अनुवाद 35 से अधिक भाषाओं में हो चुका है। साथ ही, उन्होंने डीएमके सरकार से सवाल किया कि तमिल के विकास के लिए उन्होंने कौन-सी ठोस योजनाएं लागू की हैं?
यह बयान तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के ताजा आरोपों के जवाब में आया है। स्टालिन ने केंद्र पर “एक भाषा, तीन लिपि” नीति के बहाने हिंदी थोपने का इल्जाम लगाया। उनका कहना है कि उच्चारण में जटिल हिंदी नामों को अंग्रेजी और तमिल लिपियों में हूबहू लिखना भाषाई आक्रामकता का प्रतीक है। भाजपा को हिंदी के “जुनून” के खिलाफ चेतावनी देते हुए स्टालिन ने जोर दिया कि तमिलनाडु में हिंदी के लिए कोई जगह नहीं थी, नहीं है और न रहेगी। यह विवाद रीजनल रेलवे कार्यालयों के प्रवेश परीक्षाओं से जुड़ा है, जहां हिंदी को अनिवार्य बनाने का आरोप लगाया गया।
केंद्र-राज्य के बीच यह खींचतान नई नहीं है। डीएमके के नेतृत्व वाली सरकार ने दो-भाषा फॉर्मूले पर आधारित राज्य शिक्षा नीति लागू की है, जो तमिल और अंग्रेजी को प्राथमिकता देती है। लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह मुद्दा और गरमा गया है। डीएमके गठबंधन एआईएडीएमके-भाजपा गठबंधन के खिलाफ अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भाषाई गौरव का सहारा ले रहा है। डिप्टी सीएम उदयनिधि स्टालिन ने भी हिंदी को “मातृभाषाओं को निगलने वाली” करार दिया, जो 1937-38 के पेरियार के आंदोलन की याद दिलाता है।
इस बीच, भाषाओं की सुरक्षा का मुद्दा तकनीकी दौर में और जटिल हो गया है। मातृभाषाएं संकट में हैं क्योंकि तकनीक बाजार-केंद्रित विकास पर जोर देती है। कम बोलने वालों वाली भाषाओं में निवेश की गुंजाइश कम होने से वे लुप्त होने की कगार पर हैं। भारत का आंकड़ा चिंताजनक है—1961 की जनगणना में 1652 भाषाएं दर्ज हुईं, जो 1971 तक घटकर 808 रह गईं। 2013 के भारतीय लोकभाषा सर्वेक्षण के अनुसार, 50 वर्षों में 220 भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं, जबकि 197 खतरे में हैं। तकनीक का बोलबाला बढ़ने से यह गति और तेज हो रही है।
ऐसे में नेक पहल की जरूरत है। केंद्र को भाषाई विविधता को बढ़ावा देने वाली नीतियां अपनानी चाहिए, जैसे बहुभाषी एआई टूल्स और डिजिटल अनुवाद प्लेटफॉर्म विकसित करना। तमिल जैसे प्राचीन भाषाओं को तकनीकी समर्थन देकर उनकी वैश्विक पहुंच बढ़ाई जा सकती है। राज्य सरकारें भी केंद्र के साथ सहयोग करें, न कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में उलझें। भाषा एकता का पुल होनी चाहिए, विभाजन का हथियार नहीं। यदि हम तकनीक का सदुपयोग करें, तो मातृभाषाओं का बोलबाला सुनिश्चित हो सकता है। हिंदी और तमिल—दोनों की समृद्धि ही भारत की सांस्कृतिक धरोहर को मजबूत करेगी।























