पश्चिम एशिया में उभरते संघर्ष के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य और अन्य महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर व्यापारिक जहाजों पर हो रहे हमले केवल क्षेत्रीय तनाव का संकेत नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती हैं। भारत द्वारा इन हमलों को स्पष्ट शब्दों में “अस्वीकार्य” बताया जाना न केवल कूटनीतिक संतुलन का परिचायक है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय मूल्यों की दृढ़ पक्षधरता भी है।
लंदन में अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन परिषद के 36वें सत्र में भारत के उच्चायुक्त विक्रम दोरैस्वामी का वक्तव्य इस संकट की गूंज को वैश्विक मंच तक पहुंचाता है। उनका यह कहना कि वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना और निर्दोष नाविकों की जान जोखिम में डालना सभ्य विश्व के लिए अस्वीकार्य है, वस्तुतः उस नैतिक रेखा को रेखांकित करता है, जिसे पार करना मानवता के विरुद्ध अपराध है। समुद्री मार्ग केवल व्यापार के साधन नहीं, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था की धमनियाँ हैं; इनमें अवरोध वैश्विक जीवन-चक्र को बाधित करता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य विशेष रूप से संवेदनशील है, जहां से विश्व के ऊर्जा संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। भारत जैसे देश, जिसकी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक निर्भरता इन मार्गों पर टिकी है, स्वाभाविक रूप से इस संकट से गहरे प्रभावित होते हैं। अब तक लगभग 16 जहाजों पर हमले और हजारों नाविकों की सुरक्षा पर मंडराता खतरा यह स्पष्ट करता है कि यह संकट केवल रणनीतिक नहीं, मानवीय भी है।
भारतीय नाविकों की उपस्थिति इस परिदृश्य को और भी संवेदनशील बनाती है। हजारों भारतीय समुद्री कर्मियों का जीवन इस अनिश्चितता के साये में है। ऐसे में भारत द्वारा 24 घंटे की हेल्पलाइन, त्वरित प्रतिक्रिया दल और नियंत्रण कक्ष की स्थापना न केवल प्रशासनिक तत्परता का उदाहरण है, बल्कि अपने नागरिकों के प्रति उत्तरदायित्व का प्रमाण भी है।
किन्तु प्रश्न केवल सुरक्षा उपायों तक सीमित नहीं है। यह समय वैश्विक समुदाय के लिए आत्ममंथन का है। क्या शक्ति-प्रदर्शन और सामरिक वर्चस्व की होड़ में हम अंतरराष्ट्रीय नियमों और मानवीय मर्यादाओं को भुला रहे हैं? अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है, जिसे हर हाल में संरक्षित किया जाना चाहिए।
समाधान स्पष्ट है—संयम, संवाद और सहयोग। युद्धोन्माद के इस दौर में विवेक ही सबसे बड़ी शक्ति है। यदि विश्व समुदाय समय रहते नहीं चेता, तो जलमार्गों पर उठती ये लपटें वैश्विक अस्थिरता का कारण बन सकती हैं। अतः आवश्यक है कि राष्ट्र अपने मतभेदों को वार्ता के माध्यम से सुलझाएं और समुद्र को संघर्ष का नहीं, सहयोग का मार्ग बनने दें।
• *सन्त कुमार*























