नवसंवत्सर की पहली भोर थी। प्रकृति अपने नव परिधान में सजी थी, पर भोले के चेहरे पर उत्सव की आभा नहीं, एक अनकही चिंता की रेखाएं थीं। तभी भीतर के शिव ने मुस्कुराकर छेड़ा—“आज इतने गुमसुम क्यों?” भोले ने गहरी सांस लेते हुए कहा—“क्या बताऊं, यह कैसा नववर्ष है, जहां हम जल और वन बचाने की शपथ भी लेते हैं और उसी क्षण उन्हें नष्ट करने में भी जुट जाते हैं!”
भोले की यह व्यथा केवल भावनात्मक नहीं, कठोर यथार्थ का आईना है। 21 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस और 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाने की औपचारिकता हमारे देश में एक उत्सव की तरह निभाई जाती है, किंतु इन आयोजनों के पीछे छिपी विडंबना कहीं अधिक भयावह है। यदि धरती का जलस्तर बोल पाता, तो उसकी चीखें हमारे विकास के शोर को चीर देतीं। यदि वृक्षों में रक्त होता, तो सड़कों पर बहती लाल धारा हमारे विवेक को झकझोर देती।
हमारे शहरों की चकाचौंध में बहता जल, फव्वारों और स्विमिंग पूलों की आभासी समृद्धि, उस सच्चाई को छिपा देती है कि भूजल तेजी से समाप्त हो रहा है। जल संरक्षण के मूल सिद्धांत—संग्रहण, पुनर्चक्रण और संतुलित उपयोग—के प्रति समाज की उदासीनता आने वाले संकट की दस्तक है। जैसलमेर जैसे मरुस्थलीय क्षेत्र जहां सीमित वर्षा के बावजूद आत्मनिर्भर हैं, वहीं चेरापूंजी जैसे अति वर्षा वाले क्षेत्र जल संकट से जूझ रहे हैं—यह हमारी नीतियों और सोच की विफलता का प्रमाण है।
वनों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं। राष्ट्रीय वन नीति जहां 33 प्रतिशत वन क्षेत्र की वकालत करती है, वहीं वास्तविकता इससे कोसों दूर है। विकास के नाम पर वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, पर्यावरणीय मंजूरियों में लापरवाही और ‘कैम्पा निधि’ जैसी योजनाओं में भ्रष्टाचार, यह दर्शाते हैं कि संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले ही इसके सबसे बड़े भक्षक बन बैठे हैं।
भोले की चिंता इस बात को लेकर है कि हम उत्सवों के शोर में अपने कर्तव्य की आवाज खो चुके हैं। सरकारें नीतियां बना सकती हैं, दिवस मना सकती हैं, पर जब तक समाज स्वयं अपने आचरण में परिवर्तन नहीं लाएगा, तब तक यह सब एक दिखावा मात्र रहेगा।
नवसंवत्सर का वास्तविक अर्थ केवल नए संकल्प नहीं, बल्कि उनके प्रति ईमानदार प्रतिबद्धता है। जल और वन केवल संसाधन नहीं, जीवन के आधार हैं। यदि इन्हें बचाने की जिम्मेदारी हमने आज नहीं समझी, तो आने वाली पीढ़ियां हमें क्षमा नहीं करेंगी। भोले की यह “खरी-खरी” दरअसल हमारी चेतना को जगाने का अंतिम प्रयास है—अब भी समय है, वरना उत्सव तो रह जाएंगे, पर अस्तित्व खो जाएगा।
• सेन्टी गुरु























