संपादकीय/जिला नजर :
हिमालय की नदियाँ केवल जल की धाराएँ नहीं, बल्कि राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के समीकरण भी हैं। ब्रह्मपुत्र इन्हीं में प्रमुख है, जो तिब्बत से निकलकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और बांग्लादेश तक जीवनदायिनी बनकर बहती है। लेकिन आज यह नदी ‘जल भू-राजनीति’ का नया केंद्र बन गई है। चीन तिब्बत में नामचा बरवा पर्वत के पास ब्रह्मपुत्र पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना बना रहा है। अनुमानित क्षमता 60,000 मेगावाट—वर्तमान विश्व रिकॉर्डधारी थ्री गॉर्जेस डैम (22,500 मेगावाट) से भी तीन गुना अधिक। पाँच बड़े कैस्केड बाँधों वाली इस योजना पर 1.2 ट्रिलियन युआन (लगभग 140-170 अरब डॉलर) खर्च होने का अनुमान है। इससे प्रतिवर्ष 300 अरब यूनिट बिजली पैदा होने की उम्मीद है।
भौगोलिक रूप से यह स्थान अत्यंत संवेदनशील है। यहीं नदी विशाल मोड़ लेकर अरुणाचल प्रदेश में भारत प्रवेश करती है। चीन इसे ऊर्जा सुरक्षा और विकास का प्रोजेक्ट बता रहा है, लेकिन भारत और बांग्लादेश के लिए यह रणनीतिक चिंता का विषय है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार ब्रह्मपुत्र के कुल प्रवाह का 65-70 प्रतिशत जल भारत में ही उत्पन्न होता है—मुख्यतः मानसूनी वर्षा और सहायक नदियों से। चीन के हिस्से में मात्र 22-35 प्रतिशत जल आता है। फिर भी ऊपरी धारा पर नियंत्रण से निचली धारा वाले देशों पर दबाव बनाना आसान हो जाता है।
यह परियोजना केवल बिजली की नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित करने वाली है। यदि चीन एकतरफा निर्णय लेता रहा तो भारत की जल सुरक्षा, कृषि और पर्यावरण को खतरा है। बांग्लादेश भी सूखे-बाढ़ के चक्र में फँस सकता है।
फिर भी ब्रह्मपुत्र संघर्ष की नहीं, सहयोग की धारा बन सकती है। इसके लिए जरूरी है—पारदर्शी डेटा साझेदारी, संयुक्त पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन और बहुपक्षीय जल प्रबंधन समझौता। भारत, चीन और बांग्लादेश को विश्वास, पारदर्शिता और दूरदर्शी कूटनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। तभी यह महानदी क्षेत्रीय समृद्धि का प्रतीक बनेगी, न कि तनाव की वजह।
@• सन्त कुमार























