जिला नजर – बिहार की राजनीति, जो सदैव व्यक्तित्वों की जंग रही, अब एक नई विरासत की दहलीज पर खड़ी है। 8 मार्च 2026 को जनता दल (यूनाइटेड) में नीतीश कुमार के 50 वर्षीय पुत्र निशांत कुमार का औपचारिक प्रवेश न केवल पारिवारिक कदम है, बल्कि पार्टी के भविष्य की दिशा निर्धारित करने वाला मोड़ सिद्ध हो रहा है। लंबे समय से सार्वजनिक जीवन से दूर रहने वाले इस सॉफ्टवेयर इंजीनियर की एंट्री, जो आध्यात्मिक झुकाव के लिए जाना जाता रहा, जेडीयू को ‘सुशासन बाबू’ के एकछत्र व्यक्तित्व से मुक्त कर नई पीढ़ी की ओर धकेल रही है। क्या यह परिवारवाद का पुराना दोहराव है या सियासी संकट की अनिवार्यता? बिहार का राजनीतिक इतिहास इस प्रश्न को गहरा बनाता है।
नीतीश कुमार के 2005 से चले नेतृत्व ने बिहार को अपराध और अव्यवस्था के अंधेरे से निकाला। सड़कें, बिजली, शिक्षा—महिलाओं को 50 प्रतिशत पंचायती आरक्षण, साइकिल योजना और छात्रवृत्ति ने ‘सुशासन’ की छवि गढ़ी। 2010 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने 115 सीटों का जलवा दिखाया, लेकिन 2020 में महज 43 पर सिमट गई। 2025 के चुनाव में 85 सीटों की वापसी ने राहत दी, किंतु भाजपा के बढ़ते वर्चस्व (25 प्रतिशत वोट शेयर) ने जेडीयू को आईना दिखाया। पार्टी का सामाजिक आधार—कुर्मी, कोइरी, अति पिछड़ा—खिसक रहा है, और गठबंधन की जटिलता (2013, 2017, 2022 के उतार-चढ़ाव) ने असमंजस बढ़ाया। ऐसे में निशांत की एंट्री संगठन को धुरी प्रदान करने की सियासी जरूरत लगती है।
भारतीय राजनीति में परिवारवाद कोई अनोखा पाप नहीं; यह उत्तराधिकार की स्वीकृत वास्तविकता है। आरजेडी में लालू के बाद तेजस्वी, सपा में मुलायम के बाद अखिलेश, द्रमुक में करुणानिधि के बाद स्टालिन—ये उदाहरण बताते हैं कि करिश्माई नेता के बाद परिवार ही एकजुटता की गांठ बांधता है। नीतीश, जो वर्षों परिवारवाद की आलोचना करते रहे, अब उसी राह पर हैं। जेडीयू के कार्यकर्ता मानते हैं कि निशांत की मौजूदगी पार्टी को बिखराव से बचाएगी, खासकर जब भाजपा बिहार में अपना सीएम चेहरा आगे बढ़ा सकती है।
किंतु चुनौतियाँ विशाल हैं। निशांत को ‘नीतीश का बेटा’ की छाया से निकलकर अपनी पहचान गढ़नी होगी। संगठन मजबूती, युवा नेतृत्व का समावेश, और गठबंधन संतुलन—ये उनकी कसौटियाँ हैं। ओडिशा के नवीन पटनायक की तरह, जो संकोची शुरुआत से 24 वर्षों का शासन रचे, निशांत के पास धैर्य और समय है। युवा विधायकों की टीम उनके साथ है, लेकिन प्रतीकात्मकता से ऊपर उठना होगा।
बिहार की राजनीति हमेशा बहसों से पनपी है। निशांत की एंट्री ने परिवारवाद बनाम जरूरत की नई बहस छेड़ी है। यदि वे जेडीयू को नई ऊर्जा दें, तो यह सियासी आवश्यकता सिद्ध होगी; अन्यथा, पुरानी कमजोरी का दोहराव। आने वाले वर्ष बताएंगे कि यह कदम स्थिरता लाएगा या संघर्ष। बिहार की धरती, जो लालू-नीतीश-तेजस्वी को देख चुकी, अब निशांत की प्रतीक्षा में है—एक नई विरासत की।























