जिला नजर मध्य पूर्व की आग ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को झुलसाना शुरू कर दिया है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इज़राइल के संयुक्त हमलों से ईरान युद्ध में धंस गया, जिसके फलस्वरूप ब्रेंट क्रूड की कीमतें 60 प्रतिशत उछलकर 82 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गईं। यह न केवल सप्लाई चेन को बाधित कर रहा है, बल्कि भारत जैसी तेल-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है। भारत, विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल आयातक देश होने के नाते, इस अस्थिरता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। 2025 में रूस से एक-तिहाई आयात के साथ कुल मांग 5.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन रही, जो वैश्विक ऊर्जा कीमतों के हर झटके को सीधे महसूस कराती है।
तेल कीमतों का उछाल भारत के आर्थिक ताने-बाने को कमजोर करता है। डॉलर-आधारित आयात बिल पहले ही 150 अरब डॉलर के आसपास घूम रहा है; अब 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से यह 1.5 अरब डॉलर बढ़ जाता है। कमजोर रुपये (वर्तमान में 85 के पार) ने दबाव को दोगुना कर दिया है, जिससे व्यापार घाटा चौड़ा हो रहा है और चालू खाता घाटा (CAD) 2.5 प्रतिशत जीडीपी से ऊपर चढ़ सकता है। सरकारी वित्त पर बोझ बढ़ रहा है—तेल सब्सिडी और उर्वरक खर्च में वृद्धि से राजकोषीय घाटा 5.9 प्रतिशत तक पहुँच सकता है। यदि कीमतें 100 डॉलर के पार बनी रहीं, तो मुद्रास्फीति 0.8 प्रतिशत ऊपर चढ़ जाएगी, जो घरेलू खपत और 7 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि को पटरी से उतार देगी। ईंधन परिवहन और विनिर्माण लागतों में इजाफा माल ढुलाई को महँगा करेगा, जो उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों को भड़काएगा।
ऐसे में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) पर सजगता अनिवार्य है। भारत के पास वर्तमान में 250 मिलियन बैरल से अधिक का स्टॉक है, जो क्रूड के लिए 25 दिन और पेट्रोल-डीजल के लिए अतिरिक्त 25 दिन मुहैया कराता है—कुल 50 दिनों की पर्याप्तता। मंगलौर, पदुर और विशाखापत्तनम में स्थित ये भंडार युद्ध जैसी आपाति में ढाल का काम करेंगे, किंतु हालिया बजट कटौती (5,876 करोड़ से घटकर 200 करोड़) विस्तार को धीमा कर रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप से रुपये को स्थिर रखने की कोशिश कर रहा है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान आयात विविधीकरण में है—रूस, अमेरिका और अफ्रीकी स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाकर होर्मुज जलडमरूमध्य के जोखिम को 41 प्रतिशत तक सीमित रखा जा सकता है।
तेल संकट मानवता का संकट है, जो मुद्रास्फीति से लेकर रोजगार तक सबको लील सकता है। भारत को नवीकरणीय ऊर्जा पर निवेश तेज करना होगा—सौर और इलेक्ट्रिक वाहनों से आयात निर्भरता घटाकर। विश्व समुदाय के साथ कूटनीतिक प्रयासों से युद्ध थामना पहला कदम है। सजगता ही हमारी ऊर्जा सुरक्षा की कुंजी है; अन्यथा, यह आग हमारी अर्थव्यवस्था को भस्म कर देगी। आइए, विविधीकरण और संरक्षण की राह पकड़ें, क्योंकि ऊर्जा स्वतंत्रता ही सच्ची आजादी है।























