• डेढ़ साल के शोध में विकसित सॉफ्टवेयर ने हादसों-झुलसने से प्रभावित हाथों को बहाल किया,
• अगला लक्ष्य ऑर्थराइटिस के 100 रोगी
जिला नजर /ब्यूरो चीफ
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झांसी। हादसों या गंभीर जलने से हाथ की पकड़ या कलाई की क्षमता खो चुके मरीजों के लिए एक नई उम्मीद जगी है। उत्तर प्रदेश के झांसी स्थित महारानी लक्ष्मीबाई राजकीय पैरामेडिकल ट्रेनिंग कॉलेज के फिजियोथेरेपी विभाग ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित थेरेपी से चमत्कारिक परिणाम हासिल किए हैं। 18 माह के गहन शोध में 35 मरीजों की कलाई और ग्रिप स्ट्रेंथ में 95 प्रतिशत से अधिक सुधार देखा गया। यह अध्ययन अब ब्रिटिश जर्नल ऑफ फिजियोथेरेपी में प्रकाशन के लिए भेजा गया है, जो स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत की बढ़ती क्षमता का प्रमाण है।
शोध मई 2024 से दिसंबर 2025 तक चला, जिसमें हादसों या जलने से प्रभावित उन 35 मरीजों को शामिल किया गया जिनकी हाथ की कार्यक्षमता बुरी तरह प्रभावित हो चुकी थी। फिजियोथेरेपी विभागाध्यक्ष डॉ. गौरव सक्सेना ने बताया, “हमने एआई आधारित ‘हैंड ग्रिपर सॉफ्टवेयर’ विकसित किया, जो फिजियो उपकरणों और कंप्यूटर सिस्टम से जुड़कर रीयल-टाइम फीडबैक देता है। थेरेपी के दौरान दर्द महसूस होने पर यह स्वतः वैकल्पिक व्यायाम सुझाता है, जबकि प्रत्येक सत्र के बाद मांसपेशियों और नसों की सक्रियता का आकलन करता है।” डॉ. सक्सेना के नेतृत्व में यह सॉफ्टवेयर न केवल व्यक्तिगत थेरेपी प्रदान करता है, बल्कि मरीज की प्रगति को ट्रैक कर भविष्यवाणी भी करता है कि कितने समय में पूर्ण बहाली संभव है।
शुरुआत में मरीजों को एआई की नई तकनीक से परिचित होने में थोड़ी कठिनाई हुई, लेकिन नियमित सत्रों के बाद परिणाम आश्चर्यजनक रहे। सभी 35 प्रतिभागियों में औसतन 95 प्रतिशत ग्रिप और कलाई की ताकत लौट आई, जिससे वे दैनिक कार्यों जैसे चीजें पकड़ना, लिखना या भारी सामान उठाना आसानी से कर पा रहे हैं। एक मरीज, 42 वर्षीय रमेश कुमार (नाम परिवर्तित), जिन्हें फैक्ट्री हादसे में हाथ झुलस गया था, ने कहा, “पहले तो हाथ बेकार हो गया लगता था, लेकिन एआई थेरेपी ने मुझे नई जिंदगी दी। अब मैं परिवार का सहारा बन सका हूं।”
इस शोध में अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विशेषज्ञों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ऑस्ट्रेलिया के पर्थ से डॉ. धीरेंद्र त्रिपाठी ने सॉफ्टवेयर डिजाइन में सहायता की, जबकि बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के डॉ. अनुपम व्यास, नम्रता सिंह और राहुल कुमार ने डेटा विश्लेषण और नैदानिक परीक्षण संभाले। डॉ. त्रिपाठी ने वीडियो कॉन्फ्रेंस में कहा, “एआई ने फिजियोथेरेपी को व्यक्तिगत और सटीक बना दिया है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह क्रांति है।”
यह सफलता स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई की भूमिका को मजबूत करती है। पारंपरिक फिजियोथेरेपी में जहां प्रगति धीमी और अनिश्चित होती है, वहीं यह सिस्टम दर्द कम करता है और रिकवरी को 30-40 प्रतिशत तेज बनाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ग्रामीण भारत में उपलब्धता बढ़ेगी, जहां विशेषज्ञों की कमी है।
अब नजर अगले चरण पर: डॉ. सक्सेना ने बताया कि ऑर्थराइटिस से पीड़ित 100 मरीजों पर शोध शुरू करने की तैयारियां पूरी हैं। “स्वीकृति मिलते ही हम इसे विस्तार देंगे। इससे बुजुर्गों को विशेष राहत मिलेगी,” उन्होंने कहा। कॉलेज प्रबंधन ने इस शोध को ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान से जोड़ते हुए फंडिंग बढ़ाने का आग्रह किया है।
यह अध्ययन न केवल मरीजों के लिए वरदान है, बल्कि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान को वैश्विक पटल पर स्थापित करने का माध्यम भी। यदि आप भी प्रभावित हैं, तो नजदीकी फिजियो सेंटर से संपर्क करें—एआई अब आपकी ताकत वापस ला सकता है!























