ब्रज क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपराओं के बीच मथुरा के मुखराई गांव में गुरुवार को विश्व प्रसिद्ध चरकुला नृत्य का भव्य आयोजन किया गया। बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं और दर्शकों के सामने जब नृत्यांगनाओं ने सिर पर जलते दीपकों से सजे चरकुला को रखकर नृत्य प्रस्तुत किया, तो पूरा परिसर तालियों और जयकारों से गूंज उठा।ब्रज में होली के दौरान अलग-अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं। कहीं लठामार होली की धूम रहती है तो कहीं कपड़ा फाड़ होली का उत्साह। इसी कड़ी में धूल होली के बाद फूलों की होली के साथ मुखराई गांव में आयोजित होने वाला चरकुला नृत्य भी खास आकर्षण बनता है। यह गांव राधा रानी का ननिहाल माना जाता है, इसलिए यहां इस परंपरा का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।लोक मान्यता के अनुसार द्वापर युग में जब राधा रानी का जन्म हुआ था, तब उनकी नानी मुखरा रानी ने खुशी में रथ के पहिए पर दीपक सजाकर नृत्य किया था। उसी घटना से प्रेरित होकर इस परंपरा की शुरुआत हुई और बाद में यह चरकुला नृत्य के नाम से प्रसिद्ध हो गया।यह नृत्य केवल कला का प्रदर्शन नहीं बल्कि साधना और संतुलन का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। नृत्यांगनाएं अपने सिर पर लगभग 40 से 50 किलो वजनी लकड़ी का चरकुला रखती हैं, जिसमें 108 जलते हुए दीपक लगे होते हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप पर भारी वजन के साथ संतुलन बनाते हुए किया गया यह नृत्य दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।कार्यक्रम के दौरान ब्रज के लोक गायकों ने होली के रसिया और भजनों की प्रस्तुति देकर माहौल को और भी भक्तिमय बना दिया। स्थानीय लोगों के अनुसार यह नृत्य आनंद, आस्था और विजय का प्रतीक माना जाता है। हर साल इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक, शोधकर्ता और श्रद्धालु मुखराई गांव पहुंचते हैं।
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राधा रानी के ननिहाल मुखराई में सजा अद्भुत ‘चरकुला नृत्य’,108 दीपकों के साथ नृत्यांगनाओं ने मोहा जनसमूह
Rahul Gaur 📍 Mathura
राहुल गौड एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें प्रिंट और डिजिटल मीडिया में कार्य करने का 10 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उत्तर प्रदेश के जनपद मथुरा में सक्रिय रहते हुए उन्होंने विभिन्न समाचार माध्यमों के लिए निष्पक्ष और प्रभावशाली रिपोर्टिंग की है। उनके कार्य में स्थानीय मुद्दों की गंभीर समझ और जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता की झलक मिलती है।























