🔹 चैनलों का खेल खत्म! लाइसेंस सरेंडर का युग शुरू…

JNN: भारतीय न्यूज़ चैनलों का भविष्य अब सिर्फ संकट में नहीं, बल्कि पूरी तरह ढलान पर है। वह माध्यम जो कभी जनमत बनाता था, सत्ता से सवाल पूछता था और करोड़ों दर्शकों को जोड़ता था, आज खाली स्टूडियो और सरेंडर होते लाइसेंस की कहानी सुना रहा है। पिछले तीन वर्षों (2023-2025) में करीब 50 टीवी चैनलों ने अपने ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस सरेंडर कर दिए हैं। यह केवल टीआरपी की गिरावट नहीं, बल्कि विश्वसनीयता के पूर्ण पतन की कहानी है।

मुख्य कारण: जनसरोकार से दूरी और डिजिटल क्रांति

🔹जनसरोकार से दूरी: न्यूज़ चैनल अब दिन-रात सांप्रदायिक, प्रायोजित और एकतरफा बहसों में उलझे रहते हैं। सत्ता के सामने पत्रकारिता का आत्मसमर्पण हो चुका है।

🔹डिजिटल शिफ्ट: दर्शक अब टीवी छोड़कर यूट्यूब, पॉडकास्ट और डिजिटल न्यूज़ की ओर रुख कर रहे हैं। भारत में डीटीएच सब्सक्राइबर्स की संख्या 72 मिलियन से घटकर 62 मिलियन हो गई है। युवा दर्शक विशेष रूप से ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर माइग्रेट हो चुके हैं।

🔹आर्थिक दबाव: विज्ञापन राजस्व में भारी गिरावट, बढ़ती लागत और घटते दर्शक। कम दर्शक मतलब कम विज्ञापन, जो चैनलों को बंद करने पर मजबूर कर रहा है।

एक बार जब कोई माध्यम अपनी विश्वसनीयता खो देता है, तो वह हमेशा के लिए हाशिए पर चला जाता है। नतीजा? चैनल बंद हो रहे हैं, नौकरियां जा रही हैं और पत्रकारिता का चेहरा बदल रहा है।

हालिया उदाहरण: बड़े नामों का सरेंडर

पिछले वर्षों में कई प्रमुख नेटवर्क्स ने अपने चैनलों को समेटा है। यहां कुछ प्रमुख उदाहरण

• ABP न्यूज़ HD: बंद हो चुका है, उच्च परिचालन लागत और कम मोनेटाइजेशन का हवाला देकर।

• NDTV गुजराती: लाइसेंस सरेंडर, साथ ही NDTV 24×7 HD, NDTV इंडिया HD और NDTV प्रॉफिट HD के प्लान्ड चैनलों के लाइसेंस भी वापस।

• सोनी (कल्वर मैक्स एंटरटेनमेंट): 26 डाउनलिंकिंग अनुमतियां सरेंडर की गईं।

• जियोस्टार: कलर्स ओडिया, MTV बीट्स, VH1 और कॉमेडी सेंट्रल जैसे चैनलों के लाइसेंस सरेंडर।

• जी एंटरटेनमेंट: जी सी बंद, साथ ही अन्य चैनल।

• टीवी टुडे नेटवर्क, एनडीटीवी, एबीपी: कई चैनल समेटे गए।

• एनाडु टेलीविजन और एंटर10 मीडिया: क्षेत्रीय चैनलों जैसे दंगल HD और दंगल ओरिया के लाइसेंस सरेंडर।

सबसे पहले प्रादेशिक चैनल गिरे, जो कभी ग्राउंड रिपोर्टिंग की पहचान थे। आज जो बचे हैं, वे कई राज्यों में सरकारी विज्ञापनों के सहारे जिंदा हैं।

वैश्विक परिदृश्य: सिर्फ भारत की कहानी नहीं

यह ट्रेंड वैश्विक है। अमेरिका और यूरोप में भी केबल न्यूज़ ढलान पर है। CNN, BBC, Fox जैसे नेटवर्क्स डिजिटल शिफ्ट को मजबूर हैं। भारत में बदलाव और तेज है:

🔹वरिष्ठ पत्रकारों के यूट्यूब चैनल लोकप्रिय हो रहे हैं।

🔹बिना सेंसर, संदर्भों के साथ कंटेंट उपलब्ध।

🔹शाम 6-8 बजे की “मुर्गा-मुर्गी बहस” से मुक्ति।

नया प्रयोग: LED वैन और डिजिटल इनोवेशन

छोटे राज्यों में GPS-ट्रैक्ड LED वैन जैसे कम लागत वाले विकल्प उभर रहे हैं—सीधे जनता से संवाद, बिना स्टूडियो ड्रामा के।

इतिहास की याद: दूरदर्शन से सरेंडर युग तक

🔹1965: दूरदर्शन का पहला 5 मिनट का बुलेटिन।

🔹1991: CNN और खाड़ी युद्ध।

🔹1992: Zee News।

🔹2000-2020: चैनलों का विस्फोट।

🔹2025 के बाद: सरेंडर युग।

🔴 कड़वा सच: आप चैनल खोल सकते हैं, लेकिन दर्शक खरीद नहीं सकते। जो माध्यम जनता से कट गया, वह तकनीक से नहीं—अविश्वसनीयता से मरा। न्यूज़ चैनलों का संकट असल में पत्रकारिता का आईना है।

 सोशल मीडिया के लिए 5 तीखे वन-लाइनर

🔹 चैनल बंद नहीं हो रहे, भरोसा बंद हो गया है।

🔹आप चैनल खरीद सकते हैं, दर्शक नहीं।

🔹न्यूज़ नहीं बदली, नियत बदल गई—दर्शक चले गए।

🔹पत्रकारिता सत्ता के साथ खड़ी हुई, जनता दूर चली गई।

🔹TRP नहीं गिरी, विश्वसनीयता गिरी है।

यह बदलाव भारतीय मीडिया के लिए एक सबक है: विश्वसनीयता और इनोवेशन ही भविष्य तय करेंगे। क्या न्यूज़ चैनल वापसी कर पाएंगे, या डिजिटल पूरी तरह कब्जा कर लेगा? समय बताएगा।

"गांव से शहर तक, गलियों से सड़क तक- आपके इलाके की हर धड़कन को सुनता है "जिला नजर" न्यूज़ नेटवर्क: नजरिया सच का

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