JNN: उत्तर प्रदेश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026’ ने भाजपा की राजनीतिक रणनीति को गंभीर चुनौती दे दी है। ये नियम, जो उच्च शिक्षा संस्थानों में एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए हैं, अब ऊपरी जातियों के बीच असंतोष का कारण बन रहे हैं। पिछले डेढ़ साल से भाजपा जाति की बजाय धर्म के आधार पर हिंदू वोट बैंक को एकजुट करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन इन नियमों ने इस रणनीति पर पानी फेर दिया है।
नियमों का पृष्ठभूमि और विवाद
UGC ने 13 जनवरी 2026 को इन नए नियमों को अधिसूचित किया, जो 2012 के पुराने एंटी-डिस्क्रिमिनेशन फ्रेमवर्क की जगह लेते हैं। इनमें सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में ‘इक्विटी कमिटी’ गठित करने का प्रावधान है, जो भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी। भेदभाव साबित होने पर छात्रों से लेकर फैकल्टी और स्टाफ तक पर दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है, जिसमें निलंबन या निष्कासन शामिल है। हालांकि, ऊपरी जातियों के छात्र और नेता इसे ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ बता रहे हैं, क्योंकि उनके मुताबिक झूठी शिकायतों से सामान्य वर्ग के छात्रों को नुकसान हो सकता है।
इस विवाद ने राजनीतिक रूप ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी, इसे ‘अस्पष्ट’ और ‘दुरुपयोग की संभावना वाला’ बताते हुए। लेकिन तब तक उत्तर प्रदेश में विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुके थे। लखनऊ यूनिवर्सिटी में छात्रों ने धरना दिया, जबकि बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा दे दिया। कई भाजपा पदाधिकारियों ने भी पार्टी छोड़ दी, दावा करते हुए कि ये नियम हिंदुत्व को नुकसान पहुंचाएंगे।
भाजपा की रणनीति पर असर
भाजपा ने 2024 लोकसभा चुनावों के बाद हिंदू एकता पर जोर दिया था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नारा “बंटेंगे तो कटेंगे, एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे” और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का “एक रहेंगे तो नेक रहेंगे” इसी रणनीति का हिस्सा था। लेकिन UGC नियमों के बाद जमीनी फीडबैक से पता चल रहा है कि हिंदू वोट बैंक फिर से ब्राह्मण, ठाकुर, ओबीसी और दलित जैसे जातिगत खांचों में बंट रहा है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, ऊपरी जातियां खुद को ‘असुरक्षित’ महसूस कर रही हैं, जबकि ओबीसी और दलित वर्गों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं हैं।
2024 लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूला अपनाकर भाजपा को बड़ा झटका दिया था। अब 2027 विधानसभा चुनावों से पहले हिंदू वोटों का जातिगत बंटवारा भाजपा के लिए घातक साबित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर समय पर संतुलन नहीं बनाया गया, तो ये नियम भाजपा की हार का कारण बन सकते हैं।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और समर्थन
विपक्षी दल इन नियमों का समर्थन कर रहे हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा कि केंद्र सरकार को दबाव में इन नियमों को कमजोर नहीं करना चाहिए, बल्कि इन्हें मजबूत बनाना चाहिए। सीपीआई(एम) ने भी UGC से नियमों में कमियां सुधारने की मांग की, लेकिन इन्हें सांप्रदायिक तत्वों द्वारा इस्तेमाल न करने की चेतावनी दी। वहीं, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आश्वासन दिया कि किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा और नियमों का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा।
आगे की चुनौतियां
भाजपा अब केंद्र सरकार के अगले कदमों पर नजर रखे हुए है। पार्टी को अपनी मुख्य ऊपरी जाति समर्थक आधार को बनाए रखते हुए ओबीसी और अन्य पिछड़े वर्गों को भी संतुष्ट करना होगा। यदि ये विवाद नहीं सुलझा, तो 2027 में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि हिंदुत्व की छतरी के नीचे जातिगत असमानताओं को नजरअंदाज करना अब मुश्किल हो रहा है

