वैश्विक पटल पर तनाव की लहरें अब हिंद महासागर से आगे फारस की खाड़ी तक फैल चुकी हैं, जहां ईरान और इजरायल के बीच छिड़ा संघर्ष न केवल मध्य पूर्व को भवसागर में धकेल रहा है, बल्कि पूरे विश्व को अस्थिरता के भंवर में उलझा रहा है। मार्च 2026 के प्रारंभिक दिनों में अमेरिका और इजरायल द्वारा संयुक्त रूप से शुरू की गई ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ ने ईरान पर बरसाए गए हवाई हमलों से अब तक 780 से अधिक निर्दोष जानें ले ली हैं। यह युद्ध, जो प्रारंभ में सीमित लक्ष्यों तक सीमित था, अब परमाणु संयंत्रों और तेल रिफाइनरियों को निशाना बना चुका है, जिससे ऊर्जा बाजारों में उथल-पुथल मच गई है। भारत, जो वैश्विक शांति का पैरोकार और ऊर्जा सुरक्षा का संवेदनशील केंद्र है, इस संकट के बीच सतर्कता और कूटनीतिक संयम की मिसाल पेश कर रहा है।
3 मार्च को विदेश मंत्रालय ने भारतीय नागरिकों को ईरान में रहने की सलाह जारी की—घरों में रहें, अनावश्यक यात्रा टालें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की बैठक ने इस खतरे का आकलन किया, जहां ऊर्जा आयात की 85 प्रतिशत निर्भरता वाले भारत के लिए तेल कीमतों में उछाल एक आर्थिक बम साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष यदि लंबा खिंचा, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी के बादल घिर आएंगे, और भारत जैसे विकासशील देशों को मुद्रास्फीति का सामना करना पड़ेगा। फिर भी, नई दिल्ली ने तटस्थता का रुख अपनाते हुए संयुक्त राष्ट्र से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है, जो उसकी ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को प्रतिबिंबित करता है।
इस युद्ध की जड़ें गहरी हैं—इजरायल की सुरक्षा चिंताओं और ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं का घातक मेल। अमेरिका का समर्थन इजरायल को साहस दे रहा है, जबकि ईरान के हिजबुल्लाह और हूती विद्रोहियों के माध्यम से जवाबी कार्रवाई मध्य पूर्व को ज्वालामुखी में बदल रही है। लाल सागर में जहाजरानी पर हमले पहले ही वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर चुके हैं, और अब फारस की खाड़ी के तेल मार्ग खतरे में हैं। भारत के लिए यह दोहरी चुनौती है: एक ओर चाबहार बंदरगाह जैसे ईरानी प्रोजेक्ट जो अफगानिस्तान से कनेक्टिविटी का द्वार हैं, दूसरी ओर इजरायल से सैन्य और कृषि तकनीक का सहयोग। दिल्ली को इन संतुलनों को साधते हुए बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय रहना होगा।
फिर भी, इस संकट में आशा की किरण है। भारत की कूटनीति, जो नेल्सन मंडेला से लेकर यूक्रेन युद्ध तक शांति के सेतु बनी रही है, अब भी संभावनाओं से भरी है। यदि वैश्विक शक्तियां संवाद की मेज पर लौटें, तो यह युद्ध इतिहास का काला अध्याय बन सकता है। लेकिन यदि अनदेखी की गई, तो शांति की नाजुक डोर टूट जाएगी, और मानवता फिर से विभाजन के अंधेरे में डूब जाएगी। भारत, विश्व गुरु बनने की राह पर अग्रसर, इस मौके को सकारात्मक हस्तक्षेप का अवसर बनाए। आखिर, शांति ही सच्ची विजय है—एक ऐसी विजय जो सीमाओं से परे फैली हो।























