• मारपीट, हत्या, दुष्कर्म की घटनाओं ने मातृशक्ति का पर्व दागदार,
• सामाजिक तनाव और पुलिस की नाकामी पर सवाल
रंगों और उमंग का प्रतीक होली उत्तर प्रदेश में इस बार खून और आंसुओं की होली बन गई। राज्यभर से दर्जनों घटनाएं सामने आईं, जहां उत्सव की आड़ में पुरानी रंजिशें, नशा और भीड़भाड़ ने हिंसा का रूप ले लिया। गोरखपुर से बुलंदशहर तक, हत्या, सामूहिक दुष्कर्म और मारपीट की खबरें सनसनी फैला रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये घटनाएं न केवल कानून-व्यवस्था की पोल खोल रही हैं, बल्कि सामाजिक सद्भाव पर भी गहरा आघात पहुंचा रही हैं।
सबसे दर्दनाक घटना बुलंदशहर की है, जहां होली मेले में घूमने गई एक नाबालिग लड़की को चार दरिंदों ने अगवा कर सामूहिक दुष्कर्म का शिकार बनाया। पीड़िता की चीखें सुनाई न देने वाली सुनसान जगह पर इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया गया। कांग्रेस ने इसे ‘सुशासन’ के दावों पर करारा प्रहार बताते हुए सरकार से सवाल किया: “बेटियां सुरक्षित नहीं, तो ‘बेटी बचाओ’ का नारा किसके लिए?” इसी तरह, गोरखपुर में होली की शाम एक किसान की लिंचिंग हो गई। तेज रफ्तार बाइक से उड़ती धूल पर रोक लगाने पर नशे में धुत युवकों ने उसे पीट-पीटकर मार डाला। मृतक आकाश पांडे एमबीबीएस छात्र थे, जिनकी मौत ने पूरे इलाके को शोक में डुबो दिया। आरोपी गोल्डी निषाद ने गलत साइड से फॉर्च्यूनर चलाकर हादसा मचाया।
बाराबंकी के टिकरिया गांव में रंग खेलने के विवाद ने लाठी-डंडों की जंग छेड़ दी, जिसमें 11 लोग घायल हो गए। दो गुटों के बीच पथराव और मारपीट की घटना ने गांव को तनावग्रस्त कर दिया। शामली के आर्यपुरी मोहल्ले में मामूली झगड़े पर दबंगों ने लाठियां, फरसे और पत्थरों से घर पर हमला बोल दिया। सीसीटीवी फुटेज वायरल होने के बाद पुलिस हरकत में आई। रायबरेली के बछरावां में डीजे पर डांस के दौरान ईंट-पत्थर चले, जिसमें हिंदू पक्ष के 8 लोग घायल हुए। पुलिस ने 5 महिलाओं समेत 11 को गिरफ्तार किया। मैनपुरी के बुर्रा गांव में चौपाई बजाने के विवाद में एक दर्जन लोग घायल, जबकि ललितपुर में लाठी-डंडों की रार चली। पीलीभीत के जहानाबाद में 55 वर्षीय वृद्धा धनदेवी की साड़ी से गला दबाकर हत्या कर दी गई।
ये घटनाएं यूपी में होली के दौरान 50 से अधिक हिंसक मामलों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिनमें 20 से ज्यादा मौतें और सैकड़ों घायल शामिल हैं। विश्लेषण करने पर पता चलता है कि अधिकांश घटनाओं का मूल कारण नशा (शराब-भांग) और पुरानी जातीय-धार्मिक रंजिशें हैं। होली की भीड़भाड़ में पुलिस की तैनाती अपर्याप्त साबित हुई, जिससे छोटे विवाद बड़े टकराव में बदल गए। सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. रीता सिंह कहती हैं, “होली सद्भाव का पर्व है, लेकिन व्यावसायिक और सोशल मीडिया की अफवाहों ने इसे हिंसा का माध्यम बना दिया। ग्रामीण इलाकों में जागरूकता अभियान और सख्त निगरानी जरूरी है।” आंकड़ों से स्पष्ट है कि 2025 की तुलना में 2026 में 30% अधिक घटनाएं हुईं, जो ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की विफलता दर्शाती हैं।
सरकार ने प्रतिक्रिया में विशेष दिशा-निर्देश जारी किए हैं—डीजे पर पाबंदी, नशा-मुक्त अभियान और महिलाओं के लिए हेल्पलाइन। लेकिन विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि समुदाय-आधारित शांति समितियां और एआई-आधारित निगरानी से भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है। यूपी पुलिस ने 100 से अधिक गिरफ्तारियां की हैं, लेकिन सजा सुनिश्चित करना चुनौती है।
होली का उत्सव अब चेतावनी बन चुका है—रंगों के पीछे छिपी हिंसा को रोकने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी जरूरी। अन्यथा, यह पर्व सामाजिक विघटन का प्रतीक न बन जाए।























