🔹जिला नजर | आचार्य सन्त कुमार भारद्वाज
एक परिवार अस्पताल के बाहर खड़ा है। अंदर जीवन और मृत्यु की जंग चल रही है, लेकिन काउंटर पर जमा की जाने वाली रकम की चिंता उससे बड़ी हो चुकी है। डॉक्टर की सलाह से पहले बिल की फाइल सामने आ जाती है। यह किसी एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि देश के लाखों मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग के परिवारों की सच्चाई है।
इलाज: जरूरत या व्यापार?
देश के कई निजी अस्पतालों में अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन इन सुविधाओं की कीमत आम नागरिक की पहुंच से बाहर होती जा रही है। आईसीयू, सर्जरी, जांच, दवाइयां—हर चरण पर खर्च का मीटर तेज़ी से दौड़ता है। गंभीर बीमारी का मतलब अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि आर्थिक विनाश भी हो गया है।
स्वास्थ्य अर्थशास्त्रियों का मानना है कि हर साल लाखों परिवार केवल चिकित्सा खर्च के कारण आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। गहने बिकते हैं, जमीन गिरवी रखी जाती है, कर्ज बढ़ता है—और अंत में परिवार गरीबी रेखा के करीब पहुंच जाता है।
ऐसे में सवाल उठता है—क्या इलाज की गुणवत्ता मरीज की जरूरत से तय होनी चाहिए या उसकी बैंक बैलेंस से?
शिक्षा: असमानता की दूसरी तस्वीर
स्वास्थ्य के साथ-साथ शिक्षा व्यवस्था भी इसी असमानता का सामना कर रही है। निजी स्कूलों और संस्थानों की बढ़ती फीस ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को भी महंगा बना दिया है। एक ही देश में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के अलग-अलग स्तर सामाजिक खाई को और चौड़ा कर रहे हैं।
‘वन नेशन, वन ट्रीटमेंट’ और ‘वन नेशन, वन एजुकेशन’ की मांग
जब देश में ‘वन नेशन, वन चुनाव’ जैसे विचारों पर चर्चा हो सकती है, तो क्या स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकारों पर एक समान नीति लागू करने की पहल नहीं होनी चाहिए?
‘वन नेशन, वन ट्रीटमेंट’ का अर्थ है—देश के हर नागरिक को समान गुणवत्ता का उपचार, पारदर्शी शुल्क व्यवस्था और किफायती स्वास्थ्य सेवाएं।
वहीं ‘वन नेशन, वन एजुकेशन’ का उद्देश्य है—हर बच्चे को समान स्तर की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, चाहे वह किसी भी आर्थिक पृष्ठभूमि से आता हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्वास्थ्य और शिक्षा को सख्त नियमन, पारदर्शिता और समान अवसर के दायरे में लाया जाए, तो सामाजिक और आर्थिक असमानता को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
अब सवाल जनता से
🔹क्या आपने या आपके किसी परिचित ने कभी मेडिकल बिल या स्कूल फीस के बोझ को झेला है?
🔹क्या देश में एक समान और सुलभ स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था लागू होनी चाहिए?
आपकी राय इस बहस को दिशा दे सकती है।


