टोल प्लाजा आज राजस्व संग्रह का केंद्र नहीं, बल्कि कई जगहों पर सत्ता के अहंकार का अड्डा बनते जा रहे हैं। जब कानून लागू कराने वाले संस्थान ढीले पड़ते हैं, तो निजी कंपनियों के कर्मचारी खुद को कानून से ऊपर समझने लगते हैं। आम नागरिक की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह संगठित नहीं है, और व्यवस्था इसी कमजोरी का लाभ उठाती है।

👉 यह मुद्दा भावनात्मक नहीं, लोकतांत्रिक है।

👉 यह लेख आरोप नहीं, सवाल उठाता है।

👉 और सवाल पूछना ही पत्रकारिता की आत्मा है।

✍️….देश में जब भी किसी संगठित वर्ग पर संकट आता है, तो पूरा संगठन ढाल बनकर सामने खड़ा हो जाता है। शिक्षक, किसान, वकील, कर्मचारी —

एकजुटता उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

लेकिन लोकतंत्र का सबसे बड़ा वर्ग — आम नागरिक,

वह आज भी सबसे अकेला है।

टोल प्लाजा: सेवा केंद्र या सत्ता का प्रतीक?

देश भर में टोल प्लाजा पर घट रही घटनाएं अब अपवाद नहीं,

बल्कि एक खतरनाक प्रवृत्ति बनती जा रही हैं। छोटी-छोटी बातों परआम लोगों से बदसलूकी,मारपीट और धमकी —

सवाल उठता है कि

टोल कर्मियों को यह अधिकार आखिर देता कौन है?

उग्रता की जड़ में क्या है?

टोल व्यवस्था का संचालन आज अधिकांशतः निजी कंपनियों के हाथों में है। इन कंपनियों का लक्ष्य सेवा नहीं,अधिकतम वसूली बन चुका है।कर्मचारियों पर दैनिक लक्ष्य का दबाव,स्थानीय ठेकेदारों का प्रभाव और राजनीतिक संरक्षण की अफवाहें —

➡️ ये सभी मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जहां आम नागरिक सबसे कमजोर कड़ी बन जाता है। कानून का डर खत्म होना सबसे बड़ा खतरा

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि CCTV कैमरे लगे होने के बावजूद कई मामलों में न तो सख्त कार्रवाई होती है और न ही जिम्मेदारी तय होती है। जब दोषियों को सज़ा नहीं मिलती,

तो संदेश साफ़ जाता है — आप कुछ भी कर सकते हैं।

सत्ता और प्रशासन से असहज सवाल

  • क्या हर टोल कर्मी दोषी है?……….नहीं।
  • क्या हर कंपनी राजनीतिक संरक्षण में है?……..यह भी नहीं।

लेकिन यह भी सच है कि कई मामलों में स्थानीय सत्ता का मौन उग्रता को बढ़ावा देता है।और मौन भी कई बार सहमति बन जाता है। और आम आदमी की चुप्पी, व्यवस्था की बन जाती है ताकत

आम नागरिक न यूनियन बना सकता है, न सड़क पर उतर सकता है, और न ही लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सकता है। यही कारण है कि वह अपमान सहकर आगे बढ़ जाता है, और व्यवस्था और मजबूत हो जाती है।

अब दिशा बदलनी होगी यदि लोकतंत्र को सच में मजबूत करना है, तो ज़रूरी है कि —

  • टोल प्लाजा पर कठोर आचरण नियम लागू हों
  • हर विवाद की स्वतंत्र जांच हो
  • आम नागरिक के लिए त्वरित न्याय प्रणाली बने
  • दोषी चाहे कर्मचारी हो या कंपनी —कार्रवाई दिखनी चाहिए, सिर्फ कागज़ों में नहीं

एकता ताकत है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा तभी होती है जब सबसे कमजोर व्यक्ति सुरक्षित महसूस करे।

वरना सवाल यही रहेगा —

“एकता हो तो ऐसी… पर आम आदमी का क्या?”

"गांव से शहर तक, गलियों से सड़क तक- आपके इलाके की हर धड़कन को सुनता है "जिला नजर" न्यूज़ नेटवर्क: नजरिया सच का

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