इज़रायल और अमेरिका द्वारा ईरान पर किया गया संयुक्त हमला एक बार फिर यह संकेत देता है कि वैश्विक राजनीति में नैतिकता से अधिक महत्व रणनीतिक हितों का है। युद्ध के औचित्य के रूप में ईरान की नीतियों, परमाणु कार्यक्रम और मानवाधिकारों का मुद्दा उठाया गया, किंतु यह प्रश्न अनुत्तरित है कि जब वार्ता की संभावनाएं जीवित थीं, तब सैन्य कार्रवाई का रास्ता क्यों चुना गया। इतिहास गवाह है कि जब भी संवाद के द्वार बंद होते हैं, तब विनाश के द्वार खुलते हैं।
इस संघर्ष में नागरिकों की मौत, शैक्षणिक संस्थानों पर हमले और शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाए जाने जैसी घटनाएं युद्ध की अमानवीयता को उजागर करती हैं। किसी भी युद्ध में सबसे अधिक कीमत आम जनता ही चुकाती है—न तो वह नीतियां बनाती है और न ही युद्ध का निर्णय लेती है, फिर भी वही सबसे बड़ा शिकार बनती है।
भारत की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में विशेष ध्यान आकर्षित करती है। परंपरागत रूप से गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने वाला भारत अब बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच संतुलन साधने की चुनौती का सामना कर रहा है। इज़रायल के साथ बढ़ते संबंध और ईरान के साथ ऐतिहासिक मित्रता—इन दोनों के बीच संतुलन बनाना कूटनीतिक कौशल की परीक्षा है। भारत की चुप्पी या संतुलित प्रतिक्रिया को कुछ लोग रणनीतिक परिपक्वता मानते हैं, तो कुछ इसे झुकाव के रूप में देखते हैं।
यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह घटना कोई अपवाद नहीं है। अमेरिका की विदेश नीति का इतिहास इस प्रकार के हस्तक्षेपों से भरा पड़ा है। वियतनाम युद्ध से लेकर इराक और अफगानिस्तान तक, “लोकतंत्र की रक्षा” और “वैश्विक सुरक्षा” जैसे तर्कों के पीछे अक्सर आर्थिक और सामरिक हित ही प्रमुख रहे हैं। वियतनाम में रासायनिक हथियारों का उपयोग, इराक में तथाकथित “विनाशकारी हथियारों” का बहाना और अफगानिस्तान में लंबे समय तक चला संघर्ष—ये सभी उदाहरण इस प्रवृत्ति को रेखांकित करते हैं।
ईरान के संदर्भ में भी 1953 का तख्तापलट यह दर्शाता है कि किस प्रकार एक लोकतांत्रिक सरकार को केवल इसलिए हटा दिया गया क्योंकि उसने अपने संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। चिली में आयेंदे सरकार का पतन भी इसी कड़ी का हिस्सा है, जहां बाहरी हस्तक्षेप ने एक राष्ट्र की लोकतांत्रिक संरचना को कमजोर कर दिया।
स्पष्ट है कि वैश्विक शक्ति संतुलन की इस राजनीति में युद्ध केवल एक साधन है, उद्देश्य नहीं। उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की विरासत आज भी नए रूपों में सामने आ रही है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि विश्व समुदाय संवाद, सहयोग और पारस्परिक सम्मान के आधार पर आगे बढ़े।
यदि इतिहास से कोई सबक लिया जाना चाहिए, तो वह यही है कि युद्ध कभी स्थायी समाधान नहीं देता—वह केवल नए संकटों को जन्म देता है। शांति ही वह मार्ग है, जो मानवता को विनाश के इस दुष्चक्र से बाहर निकाल सकता है।























