नई दिल्ली। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान सोमवार को लोकसभा में जमकर हंगामा हुआ। विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा एक मैगजीन का आर्टिकल पढ़ने की कोशिश पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित ट्रेजरी बेंच ने कड़ा विरोध जताया। इसी बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव राहुल गांधी के समर्थन में सामने आए।

“चीन पर हमेशा सावधान रहना जरूरी” – अखिलेश यादव

अखिलेश यादव ने अपने संबोधन में डॉ. राम मनोहर लोहिया और नेताजी मुलायम सिंह यादव का उल्लेख करते हुए चीन की विस्तारवादी नीति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि चीन एक संवेदनशील विषय है और यदि देशहित में विपक्ष के नेता कोई सुझाव देना चाहते हैं, तो उन्हें सदन में अपनी बात रखने की अनुमति मिलनी चाहिए।
अखिलेश यादव ने कहा, “हमें हमेशा चीन से सावधान रहना होगा। अगर विपक्ष देशहित में कुछ कहना चाहता है, तो उसे सुना जाना चाहिए।”

“सदन मनमानी से नहीं चलेगा” – सरकार का पलटवार

राहुल गांधी के अड़े रहने पर संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि स्पीकर की रूलिंग के बावजूद विपक्ष के नेता बार-बार वही सामग्री पढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। रिजिजू ने कहा, “विपक्ष के नेता खुद बोलना नहीं चाहते। सदन किसी की मनमानी से नहीं चलेगा। हम सुनने के लिए तैयार हैं, लेकिन नियमों के भीतर।”

अमित शाह बनाम के.सी. वेणुगोपाल: नियमों पर टकराव

बहस के दौरान कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने नियम 349 का हवाला देते हुए भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या पर कांग्रेस को बदनाम करने का आरोप लगाया। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि तेजस्वी सूर्या ने केवल 2004 से 2014 तक के राष्ट्रपति अभिभाषण से जुड़े तथ्यों को उद्धृत किया है और इसका जवाब भी तथ्यों के आधार पर ही दिया जाना चाहिए।

स्पीकर की नसीहत: “विपक्ष के नेता स्वयं रखें पक्ष”

जब वेणुगोपाल राहुल गांधी के समर्थन में दलीलें देते रहे, तो लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष स्वयं अपनी बात रखने में सक्षम हैं। शोरगुल बढ़ने पर स्पीकर ने स्पष्ट निर्देश दिए कि विपक्ष के नेता को बोलने दिया जाए, लेकिन सदन की कार्यवाही नियमों के अनुसार ही चलेगी

लगातार टकराव के चलते लोकसभा का माहौल तनावपूर्ण बना रहा। सत्ता पक्ष जहां संसदीय नियमों के पालन पर जोर देता दिखा, वहीं विपक्ष अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संदर्भ सामग्री के उपयोग की बात करता रहा। यह घटनाक्रम संसद में नियमों की व्याख्या और अभिव्यक्ति की सीमाओं को लेकर नई बहस को जन्म देता नजर आया।

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