नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट सोमवार को दिल्ली दंगों के कथित बड़े षड्यंत्र मामले में आरोपी उमर खालिद, शरजील इमाम , गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद की जमानत अर्जी पर अपना फैसला सुनाएगा। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच याचिकाओं पर सुनवाई कर चुकी है। आरोपियों ने 2 सितंबर के दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से दिए गए फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की हुई है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत देने से इनकार किया था। इस मामले में आरोपी याचिकाकर्ता पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से हिरासत में हैं और उन पर गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) के तहत गंभीर अपराधों के आरोप लगाए गए हैं। दिल्ली पुलिस ने उमर, शारजील और अन्य की जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि फरवरी 2020 के दंगे खुद ब खुद नहीं हुए थे, बल्कि भारत की संप्रभुता पर ‘पूर्व नियोजित, सुनियोजित और सुविचारित हमला’ थे।
वहीं याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से मुकदमे में देरी और इसके जल्द शुरू होने की कम संभावना पर जोर दिया। याची ने तर्क दिया कि पांच साल बीत जाने के बाद भी ऐसा कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने दंगे भड़काए। दोनों पक्षों की दलील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले में 10 दिसंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से मुकदमे में हो रही देरी और निकट भविष्य में ट्रायल शुरू होने की संभावना न होने पर जोर दिया। वरिष्ठ वकील डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी (गुलफिशा फातिमा की ओर से), वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल (उमर खालिद की ओर से) और वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे (शरजील इमाम की ओर से) ने तर्क दिया कि पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने दंगों को भड़काया था।
सिंघवी ने अदालत को बताया कि गुलफिशा लगभग छह वर्षों से हिरासत में हैं और वह एकमात्र महिला हैं जिन्हें उन आरोपों के लिए भी जमानत नहीं दी गई है, उन पर सह-आरोपियों देवांगना कलिता और नताशा नरवाल पर लगाए गए आरोपों से समान या उनसे भी कम गंभीर हैं, जबकि बाकियों को 2021 में ही जमानत मिल चुकी थी। उन्होंने यह भी कहा कि ‘सरकार बदलने’ (रेजीम चेंज) का जो तथाकथित तर्क पुलिस की ओर से दिया जा रहा है, वह न तो मुख्य चार्जशीट में है और न ही पूरक चार्जशीट में उनका जिक्र है।
सिंघवी ने यह भी कहा कि गुलफिशा की जमानत याचिका 90 बार लिस्टेड हुई, जिनमें 25 बार पीठ की अनुपलब्धता के कारण मामले की सुनवाई नहीं हो सकी और 26 बार मामले को दोबारा सूचीबद्ध किया गया। उन्होंने इसे न्याय व्यवस्था की एक ‘कार्टून जैसी तस्वीर’ बताया और कहा कि 32 वर्षीय महिला को इतने लंबे समय तक हिरासत में रखे जाने से कोई भी जनहित सधता नहीं है।
उमर खालिद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया कि फरवरी 2020 में जब दिल्ली में दंगे हुए, उस समय उमर खालिद दिल्ली में मौजूद ही नहीं थे। अभियोजन पक्ष द्वारा जिस भाषण का हवाला दिया गया है, वह अमरावती में दिया गया था और वास्तव में वह नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ गांधीवादी अहिंसक विरोध का आह्वान था। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में खालिद का भाषण चलाकर भी सुनाया गया।
सिब्बल ने कहा, ‘ये छात्र हैं, वे सही या गलत तरीके से आंदोलन करते हैं। युवावस्था में हम भी आंदोलन किया करते थे। यदि हम विरोध करते हैं, तो इसके लिए मुझे जेल में डालने या दोषी ठहराने का कोई औचित्य नहीं है। केवल विरोध करने के कारण आप मुझे जेल में बंद नहीं रख सकते।’ उन्होंने कहा कि चक्का जाम और रेल रोको जैसे विरोध प्रदर्शन भारत में जन आंदोलनों के दौरान बहुत आम हैं और भले ही वे कानून की सख्त शब्दावली के अनुरूप न हों, लेकिन उन्हें यूएपीए के तहत ‘आतंकवादी कृत्य’ नहीं कहा जा सकता।
शरजील इमाम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने कहा कि इमाम के जिन भाषणों को अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ने खुली अदालत में चलाया था, उन भाषणों के लिए उनके खिलाफ पहले से ही अलग-अलग मामलों में अभियोजन चल रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इमाम जनवरी 2020 से ही हिरासत में हैं, यानी दंगों से एक माह पहले से, और यह हिरासत उन्हीं भाषणों के कारण है।
दिल्ली पुलिस की ओर से मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया कि ये विरोध प्रदर्शन खुद ब खुद नहीं थे, बल्कि एक सुनियोजित ‘पैन इंडिया’ साजिश का हिस्सा थे, जिसका उद्देश्य ‘सरकार बदलना’ और ‘आर्थिक गला घोंटना’ था। इस संदर्भ में विभिन्न व्हाट्सएप समूहों, दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप (डीपीएसजी) और जामिया अवेयरनेस कैंपेन टीम का उल्लेख किया गया। यह भी दलील दी गई कि मुकदमे में हुई देरी के लिए स्वयं याचिकाकर्ता जिम्मेदार हैं और यदि वे सहयोग करें, तो ट्रायल दो वर्षों के भीतर पूरा किया जा सकता है।
20 नवंबर को दिल्ली पुलिस ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू के माध्यम से यह भी कहा कि अदालत के बाहर एक ऐसा नैरेटिव गढ़ा गया है कि ये लोग ‘बौद्धिक’ हैं, जबकि वास्तव में ये शिक्षित आतंकवादी हैं और समाज के लिए खतरनाक हैं। एएसजी राजू ने एक वीडियो चलाया, जिसमें इमाम के कथित भड़काऊ भाषणों के विभिन्न अंश शामिल थे।
इन भाषणों में उन्हें यह कहते हुए सुना गया कि देश के सभी शहरों में चक्का जाम होना चाहिए, मुसलमानों को एकजुट होकर असम को भारत से जोड़ने वाले ‘चिकन नेक’ क्षेत्र को काट देना चाहिए और उत्तर-पूर्व को मुख्य भूमि से अलग कर देना चाहिए, दिल्ली को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित करनी चाहिए, सरकार को पंगु बना देना चाहिए और यह कि अदालतों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।





