भोले की खरी खरी…….
भोले कहे—अरे भइया, ये कैसी अजब-गजब दुकान खुली है लोकतंत्र की गली में! इधर नौजवान चप्पल घिस-घिस कर परीक्षाओं की कतार में खड़े हैं, उधर बिना सिलेबस, बिना इंटरव्यू, सीधे कुर्सी पर विराजमान होने की कला भी खूब फल-फूल रही है। कोई इसे सेवा बताता है, तो कोई इसे मलाईदार नौकरी बताकर भी आंख नहीं झपकाता। अब भोले का दिमाग भन्नाया है—जब पगार भी है, पेंशन भी है, तो सेवा का ये चोला आखिर किसे बहलाने के लिए है?
और सुनिए, इस लोकतंत्र की थाली में एक और तीखा तड़का है। देश में जितने भी जातीय और क्षेत्रीय ठेकेदारी के मठाधीश बने बैठे हैं, उन्हें जनहित के मुद्दों पर जैसे “मौन व्रत” लग जाता है। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य—इन पर आते ही इनके मुँह में दही जम जाता है। लेकिन जैसे ही फालतू के मुद्दों का माइक मिलता है, लोकतंत्र के मंदिर में ऐसा शोर मचाते हैं कि मानो देश की सबसे बड़ी समस्या वही हो! आखिर क्यों न हो—खर्च तो अपनी जेब से नहीं, जनता की गाढ़ी कमाई से जो हो रहा है।
एक तरफ वह युवा है, जो हर साल फॉर्म भरते-भरते अपनी उम्मीदों की आखिरी बूंद तक निचोड़ देता है। पेपर लीक, तारीखों का खेल और सिस्टम की लचर चाल—सब कुछ झेलते हुए भी उम्मीद का दिया बुझने नहीं देता। दूसरी तरफ एक ऐसा रास्ता है, जहां बिना किसी औपचारिक कसौटी के सत्ता की सीढ़ियां चढ़ी जाती हैं।
हाँ, यह तर्क दिया जाता है कि जनता का वोट ही सबसे बड़ी परीक्षा है। भोले मानता है, इसमें दम है। मगर सवाल यह भी है कि क्या यही एकमात्र पैमाना काफी है? क्या जवाबदेही और पारदर्शिता की कसौटी सिर्फ भाषणों तक सीमित रहनी चाहिए?
भोले की नजर में, यह पूरा खेल अब समझ से परे नहीं रहा। युवा अब सवाल पूछ रहा है, और यही सबसे बड़ा बदलाव है। क्योंकि जब सवालों में मिर्ची होगी, तभी जवाबों की सच्चाई पसीना बहाएगी। लोकतंत्र की यही असली परीक्षा है—और इस बार भोले भी देख रहा है, कौन पास होता है और कौन सिर्फ भाषणों में टॉप करता है।
*सेन्टी गुरु*























