नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने हाल ही में अपने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन की नियुक्ति की है। 45 वर्षीय नवीन, जो बिहार के बैंकिपुर से पांच बार विधायक रह चुके हैं, पार्टी के इतिहास में सबसे युवा अध्यक्ष हैं। उनकी नियुक्ति को पार्टी में ‘पीढ़ीगत बदलाव’ के रूप में पेश किया जा रहा है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों और मीडिया रिपोर्ट्स में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह मोदी युग के बाद की सत्ता संघर्ष की तैयारी है? नवीन न तो ओबीसी हैं, न दलित, न दक्षिण भारत से, न पश्चिम बंगाल से जुड़े, न ही कोई बड़ा संगठनकर्ता या विचारक। फिर क्या खासियत है जो उन्हें 10 करोड़ सदस्यों वाली दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का मुखिया बनाती है?
नवीन का राजनीतिक सफर: एक सामान्य कार्यकर्ता से शीर्ष तक
नितिन नवीन का जन्म 23 मई 1980 को रांची (झारखंड) में हुआ था, लेकिन उनका पालन-पोषण पटना में हुआ। उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा भाजपा के वरिष्ठ नेता और बिहार विधानसभा के चार बार सदस्य रह चुके हैं, जिससे नवीन को राजनीतिक विरासत मिली। शिक्षा की बात करें तो नवीन केवल 12वीं पास हैं—1998 में दिल्ली के सीएसकेएम पब्लिक स्कूल से इंटरमीडिएट किया। वे बिहार सरकार में विभिन्न मंत्रालयों (जैसे शहरी विकास, सड़क निर्माण और कानून) में मंत्री रह चुके हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनका जनाधार सीमित है। दिसंबर 2025 में उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया और जनवरी 2026 में पूर्ण अध्यक्ष। समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और पूर्व अध्यक्ष जेपी नड्डा मौजूद थे, जहां मोदी ने उन्हें ‘मिलेनियल लीडर’ और अपना ‘बॉस’ तक कहा।
हालांकि, मीडिया में इसे ‘राजनीतिक वंशवाद’ का उदाहरण बताया जा रहा है। द वायर में लिखा गया है कि नवीन कायस्थ जाति से हैं, जो अब भाजपा में लगभग विलुप्त हो चुकी है, और उनकी नियुक्ति छत्तीसगढ़ चुनाव में योगदान के नाम पर हुई, लेकिन असल में यह मोदी-शाह की पसंद है।
क्यों नवीन? क्या यह 2029 चुनाव की तैयारी है?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नवीन की नियुक्ति कोई संयोग नहीं, बल्कि एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। वे जनाधार-रहित और अपेक्षाकृत अनुभवहीन हैं, जिससे उन्हें ‘शतरंज का छोटा प्यादा’ कहा जा रहा है। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी में गोटियां सेट की जा रही हैं, और खेल का नाम है ‘मोदी के बाद कौन बनेगा प्रधानमंत्री?’ मुख्य खिलाड़ी हैं अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।
अमित शाह की भूमिका : शाह को मोदी का सबसे भरोसेमंद सहयोगी माना जाता है। हालिया बॉडी लैंग्वेज और मीडिया इंटरैक्शन से लगता है कि वे खुद को मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में पेश कर रहे हैं। द प्रिंट में डीके सिंह लिखते हैं कि नवीन शाह के करीबी हैं, और उनकी नियुक्ति से मोदी ने शाह को संगठन पर पूर्ण नियंत्रण सौंप दिया है। टेलीग्राफ इंडिया के संपादकीय में कहा गया कि यह मोदी-शाह की पार्टी पर गहराती पकड़ का प्रमाण है।
योगी आदित्यनाथ का दावा : योगी को हिंदुत्व की विरासत का असली वारिस माना जाता है। आरएसएस के साथ उनके मजबूत संबंध हैं, और वे खुद को भाजपा की विचारधारा का प्रतीक मानते हैं। नवीन की नियुक्ति पर योगी ने बधाई दी, लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि इससे योगी को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ेगी। काउंटरकरंट्स में अरुण श्रीवास्तव लिखते हैं कि नवीन की नियुक्ति से मोदी ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की साख को कमजोर किया है।
कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, शाह धर्मेंद्र प्रधान या भूपेंद्र यादव को अध्यक्ष बनाना चाहते थे, लेकिन आरएसएस गुजराती लॉबी से बाहर किसी को चाहता था। अंततः नवीन का नाम तय हुआ, जिन्हें गुजराती लॉबी का ही माना जाता है और वे मोदी-शाह के इशारे पर चलेंगे। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर भी ऐसी ही राय है—एक यूजर ने लिखा कि नवीन मोदी-शाह का ‘रिमोट कंट्रोल’ ऑपरेटर हैं।
आगामी संघर्ष: मोदी की विरासत बनाम हिंदुत्व की सियासत
भाजपा का अगला आंतरिक संघर्ष मोदी की ‘विकास-केंद्रित’ विरासत और योगी के ‘कट्टर हिंदुत्व’ के बीच हो सकता है। नवीन की भूमिका फिलहाल छोटी लगती है, लेकिन राजनीति में ‘जीरो’ कभी-कभी ‘हीरो’ बन जाता है। उनकी कमजोर पृष्ठभूमि उन्हें नियंत्रित करने में आसान बनाती है, जो शाह के लिए फायदेमंद है। विपक्षी नेता जैसे कांग्रेस की रेणुका चौधरी ने सवाल उठाया कि क्या नवीन स्वतंत्र होंगे या आरएसएस-मोदी के कठपुतली?
एक्स पर एक पोस्ट में इतिहास से तुलना की गई कि औरंगजेब की मौत के बाद मुगल साम्राज्य का पतन हुआ क्योंकि उन्होंने उत्तराधिकार नहीं सौंपा। लेकिन भाजपा में बहु-विकल्पीय योजना है, जिसमें शाह और योगी प्रमुख हैं
एक नया दौर या पुरानी रणनीति?
नितिन नवीन की नियुक्ति भाजपा में युवा नेतृत्व को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन यह मोदी-शाह की सत्ता को मजबूत करने की कवायद ज्यादा लगती है। 2029 चुनाव से पहले यह ‘खेल’ और दिलचस्प होगा, जहां हिंदुत्व, विकास और उत्तराधिकार की जंग छिड़ सकती है। क्या नवीन सिर्फ प्यादा रहेंगे या कोई बड़ा मोहरा? समय बताएगा।
(यह विश्लेषण मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक चर्चाओं पर आधारित है। विचार लेखक के हैं।)





