जिला नजर मध्य पूर्व की रेतीली भूमि पर फिर से युद्ध का काला बादल मंडरा रहा है, जहाँ आकाश में गर्जन और धरती पर विलाप का संगीत बज रहा है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल ने संयुक्त हवाई हमलों की बौछार बरसाई, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता सहित अनेक उच्च अधिकारियों की जान चली गई। मात्र 12 घंटों में 900 से अधिक स्ट्राइक्स ने ईरानी मिसाइलों, वायु रक्षा प्रणालियों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, मानो स्वर्ग से क्रोध की वर्षा हो रही हो। आज, 10 मार्च को यह संघर्ष ग्यारहवें दिन में प्रवेश कर चुका है, और ईरानी राज्य मीडिया के अनुसार, 1,332 से अधिक निर्दोष प्राणों की आहुति हो चुकी है। सैटेलाइट चित्रों से खुलासा होता है कि तेहरान के आसपास के सैन्य अड्डे खंडहरों में तब्दील हो चुके हैं, जबकि तेल भंडारण स्थलों पर हमलों ने काले धुएँ की चादर बिछा दी है।
यह ‘पूर्वानुमानित’ आक्रमण, जैसा कि इज़राइल ने इसे नाम दिया, न्यूक्लियर महत्वाकांक्षाओं और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों को कुचलने का दावा करता है। किंतु क्या यह आत्मरक्षा है या साम्राज्यवादी विस्तार? ट्रंप प्रशासन की कठोर नीति ने क्षेत्रीय संतुलन को भंग कर दिया है, जहाँ हिजबुल्लाह के जवाबी ड्रोन और ईरानी मिसाइलें अमेरिकी ठिकानों को ललकार रही हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था काँप रही है—तेल कीमतें आसमान छू रही हैं, और संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी अनसुनी हो रही है। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन कूटनीतिक पुल बनाने की कोशिश में हैं, किंतु यह युद्ध मानवीय त्रासदी का प्रतीक बन चुका है: विधवाओं का रोना, बच्चों का भय, और विस्थापितों का कारवाँ।
ईरान ने मोक्तबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता नियुक्त कर प्रतिरोध की लौ जलाए रखी है, किंतु क्या यह चक्र हिंसा का अंतिम अध्याय होगा? इतिहास सिखाता है कि बमों की गूँज शांति नहीं लाती, बल्कि घावों की सिलसिला बढ़ाती है। विश्व समुदाय को जागना होगा—बहुपक्षीय वार्ता, आर्थिक प्रतिबंधों का पुनर्विचार, और मानवीय सहायता के द्वार खोलने का समय है। अन्यथा, यह मध्य पूर्व का युद्ध नहीं, बल्कि मानवता का संकट सिद्ध होगा। आइए, शांति की प्रार्थना करें, क्योंकि युद्ध की आग में सबका घर जलता है।
• संपादक की कलम से























