जिला नजर-दिल्ली की धुंधली सुबहों में विकास की किरणें अब चमकने लगी हैं, लेकिन क्या ये किरणें स्थायी सूर्योदय का संकेत हैं? ट्रिपल इंजन सरकार—केंद्र, राज्य और नगर निकाय के तालमेल का प्रतीक—अपना एक वर्ष पूर्ण कर रही है, और इस अवसर पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का दावा है कि दिल्ली अब नई गति पकड़ चुकी है। किंतु सच्चाई की कसौटी पर खरा उतरने के लिए उपलब्धियों के साथ कमियों का ईमानदारी से मूल्यांकन जरूरी है। जनता की नजरें केवल आंकड़ों पर नहीं, बल्कि सड़कों पर बिछे कंक्रीट, अस्पतालों में उपलब्ध दवाओं और स्कूलों में रोशन चेहरों पर टिकी हैं। यदि सहयोग की यह त्रयी टकराव की राजनीति को पीछे छोड़ दे, तो राजधानी वाकई एक वैश्विक मॉडल बन सकती है—स्वच्छ, समावेशी और समृद्ध।
2026-27 के केंद्रीय बजट में दिल्ली के लिए 70,000 करोड़ रुपये का प्रावधान न केवल आर्थिक इंजेक्शन है, बल्कि बुनियादी ढांचे की मजबूत नींव का वादा है। सड़क नेटवर्क का विस्तार, मेट्रो की 50 किलोमीटर नई लाइनों का खाका, जलापूर्ति में 20 प्रतिशत वृद्धि, तथा प्रदूषण नियंत्रण के लिए 5,000 करोड़ का अलग कोष—ये घोषणाएँ दिल्ली को ‘आदर्श नगरी’ की ओर धकेल रही हैं। रेखा गुप्ता सरकार के पहले वर्ष में ‘दिल्ली लखपति बिटिया योजना’ ने 2 लाख से अधिक बालिकाओं को सशक्त बनाया, जहां प्रत्येक को 10,000 रुपये की सहायता से उच्च शिक्षा का मार्ग प्रशस्त हुआ। मुफ्त एलपीजी सिलेंडर योजना के तहत 15 लाख परिवारों को राहत मिली, जिससे स्वच्छ ईंधन उपयोग 12 प्रतिशत बढ़ा। अधूरी परियोजनाओं को गति मिली—जैसे केजरीवाल युग की लंबित 200 किलोमीटर साइकिल ट्रैक अब 70 प्रतिशत पूर्ण हो चुकी हैं, और पूर्वी दिल्ली के जलाशयों का पुनरुद्धार 40 करोड़ निवेश से संभव हुआ।
ट्रिपल इंजन का जादू वित्तीय समन्वय में झलकता है। पहले 13-14 प्रतिशत ब्याज पर ऋण की मार झेलने वाली दिल्ली सरकार अब केंद्र की बदौलत 7 प्रतिशत पर 21,000 करोड़ तक की पूंजी जुटा सकती है। आयुष्मान भारत मिशन का विस्तार अब 90 लाख दिल्लीवासियों को कवर करता है, जहां 2025 में 5 लाख लाभार्थियों ने मुफ्त इलाज पाया। पीएम भीम योजना की समयावधि बढ़ाने से डिजिटल भुगतान 25 प्रतिशत उछला, जो आर्थिक समावेशन का प्रतीक है। फिर भी, चुनौतियाँ कम नहीं: हवा की गुणवत्ता सूचकांक (AQI) औसतन 250 पर अटका है, अपराध दर में 8 प्रतिशत वृद्धि हुई, और बाढ़ प्रबंधन में अभी भी खामियाँ बाकी हैं।
समय है आत्ममंथन का। सरकार को उपलब्धियों का प्रचार कम, क्रियान्वयन पर जोर देना होगा। जनता की अपेक्षाएँ ऊँची हैं—वह वादों से नहीं, परिवर्तन से तृप्त होगी। यदि ट्रिपल इंजन की गति बनी रही, तो दिल्ली समस्याओं का प्रतीक नहीं, समाधानों का सिंधु बनेगी। आइए, नेतृत्व विकास की इस यात्रा में सभी अपना सहयोग साझा करें, क्योंकि राजधानी का उज्ज्वल भविष्य सबका है।























