उत्तर प्रदेश का जन-चौपाल अभियान: जनसंवाद या राजनीतिक प्रदर्शन?
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और विविधताओं से भरे राज्य में यदि कोई सरकार “जनसंवाद” का दावा करती है, तो उससे अपेक्षा भी उतनी ही बड़ी होती है। सरकार द्वारा संचालित ‘जन-चौपाल अभियान’ भी पहली नज़र में जनता से सीधे जुड़ने, समस्याएँ सुनने और योजनाओं को ज़मीनी स्तर तक पहुँचाने की एक सराहनीय पहल प्रतीत होती है।
लेकिन जब इस अभियान की परतें खुलती हैं, तो तस्वीर उतनी उजली नहीं दिखती। लाखों रुपये के खर्च, व्यवस्थागत लापरवाही, और राजनीतिक भाषणबाज़ी इसे जनसेवा से अधिक राजनीतिक मंच बनाती नज़र आती है।
हाल ही में आगरा के फतेहाबाद में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की उपस्थिति में आयोजित जन-चौपाल ने इस अभियान की हकीकत को सार्वजनिक कर दिया—जहाँ लाइट गुल, सुरक्षा में सेंध, विकास कार्यों में लीपापोती और अव्यवस्था ने पूरे आयोजन की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए।
उद्देश्य और हकीकत के बीच की खाई
सरकारी दावों के अनुसार, जन-चौपाल का उद्देश्य किसान, मजदूर, महिला और वंचित वर्ग को सरकारी योजनाओं से जोड़ना है। अधिकारी जनता की शिकायतें सुनते हैं, मौके पर समाधान के निर्देश दिए जाते हैं और “संवेदनशील प्रशासन” का संदेश दिया जाता है।
लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि अधिकांश चौपालें औपचारिकता और भाषणों तक सीमित रह जाती हैं। समस्याओं की सूची तो बनती है, पर समाधान अक्सर फाइलों में ही दम तोड़ देता है।
प्रत्येक चौपाल पर टेंट, मंच, साउंड, लाइट, प्रचार, गाड़ियाँ और सुरक्षा—इन सब पर लाखों रुपये खर्च होते हैं। यह पैसा जनता के कर से आता है। सवाल सीधा है—
क्या यही पैसा स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं पर नहीं लगाया जा सकता?
यदि प्रशासन अपने दफ्तरों में ही जवाबदेह हो, तो जनता को चौपाल की कतारों में खड़े होने की ज़रूरत ही क्यों पड़े?
आगरा की जन-चौपाल: अव्यवस्था की मिसाल
फतेहाबाद की जन-चौपाल में जिले के तमाम वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे, फिर भी कार्यक्रम के दौरान करीब 15 मिनट तक बत्ती गुल रही… माइक बंद रहे। जेनरेटर समय पर चालू नहीं हुआ। मंच पर बैठे लोग असहज दिखे और उपमुख्यमंत्री को स्वयं नाराज़गी जतानी पड़ी।
यह केवल बिजली का फेल होना नहीं था, बल्कि पूरी व्यवस्था के फेल होने का प्रतीक था।
इसी कार्यक्रम में एक सामाजिक कार्यकर्ता के महंगे जूते चोरी हो गए—जो सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। वहीं, लाइट जाने पर टेंट संचालक की फर्म को ब्लैक लिस्ट करना का उचित है ये तो मात्र प्रशासनिक संवेदनशीलता पर एक और काला धब्बा है।
जिस मंच से “सुशासन” का संदेश दिया जा रहा हो, वहीं अव्यवस्था और भय का माहौल हो—तो संदेश जनता तक क्या पहुँचेगा?
जनहित या राजनीतिक हित?
आलोचकों का कहना है कि जन-चौपाल अब जनसंवाद कम और राजनीतिक प्रदर्शन अधिक बन चुका है। मंच से योजनाओं से ज़्यादा विपक्ष पर हमले, उपलब्धियों की सूची और चुनावी संदेश सुनाई देते हैं।
“इसी कारण कई लोग इसे ‘जन-चौपाल’ नहीं बल्कि ‘पार्टी-चौपाल’ कहने लगे हैं।”
यदि वास्तव में सरकार जनता का भला चाहती है, तो उसे यह आत्ममंथन करना होगा कि
🔹अधिकारी चौपाल में ही क्यों सक्रिय दिखते हैं, दफ्तरों में क्यों नहीं?
🔹क्या समस्याओं के समाधान के लिए मंच ज़रूरी है, या मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति?
आगे का रास्ता: दिखावे से समाधान की ओर
जन-चौपाल को प्रभावी बनाने के लिए सरकार को कुछ ठोस कदम उठाने होंगे—
🔹विभागीय जवाबदेही तय हो: शिकायतों के निस्तारण की समय-सीमा और सार्वजनिक ट्रैकिंग हो।
🔹खर्च की पारदर्शिता: हर चौपाल के खर्च का सार्वजनिक ऑडिट किया जाए।
🔹राजनीति से दूरी: मंच जनहित का हो, न कि विपक्ष को गरियाने का।
🔹बुनियादी व्यवस्थाएँ दुरुस्त हों: ताकि आगरा जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
जनता को शो नहीं, समाधान चाहिए
• जन-चौपाल का विचार गलत नहीं है, लेकिन उसका वर्तमान स्वरूप सवालों के घेरे में है।
• आगरा की घटना एक चेतावनी है—कि यदि जनसेवा के नाम पर सिर्फ दिखावा और राजनीति होगी, तो जनता का भरोसा टूटेगा।
• उत्तर प्रदेश की जनता महंगे आयोजन नहीं, ईमानदार प्रशासन चाहती है।
अब समय आ गया है कि सरकार यह तय करे—
“जन-चौपाल जनता के लिए है, या जनता के नाम पर एक और खर्चीला तमाशा?”
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🗞️ सन्त कुमार भारद्वाज…. ✍️





