भोले से मुलाकात हुई तो सोचा, इस बार जरा पत्रकार संगठनों की नब्ज टटोली जाए। लेकिन जैसे ही सवाल छेड़ा, भोले पहली बार बिना रुके, बिना टोके, एकतरफा बोलने लगे—मानो बरसों से जमा शब्दों को आज रास्ता मिल गया हो। चेहरे पर मुस्कान थी, पर शब्दों में चुभन साफ झलक रही थी।
भोले उवाच—“आजकल पत्रकार संगठन खुद को लोकतंत्र का ‘वॉचडॉग’ बताते हैं, पर कई बार हालात ऐसे लगते हैं जैसे ये ‘वॉच-ऑन-डॉग’ बनकर बस तमाशा देख रहे हों।” बात कड़वी जरूर है, मगर हवा में नहीं है। कागजों पर ये संगठन पत्रकारों के अधिकारों के प्रहरी हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में कई बार उनकी आवाज़ उतनी बुलंद नहीं सुनाई देती, जितनी होनी चाहिए।
भोले ने आगे तंज कसा—“जब किसी बड़े नाम पर संकट आता है, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों तक बयानबाज़ी की बाढ़ आ जाती है। पर वही खतरा अगर किसी छोटे शहर के फ्रीलांसर पर आए, तो संगठन की ‘नेटवर्किंग’ अचानक ‘नेटवर्क आउट ऑफ कवरेज’ हो जाती है।” यह सच उस असमानता की ओर इशारा करता है, जो पत्रकारिता के भीतर ही पनप रही है।
डिजिटल युग में पत्रकारिता नई चुनौतियों से जूझ रही है—फेक न्यूज, ट्रोल आर्मी, और सोशल मीडिया का दबाव। भोले कहते हैं, “आज पत्रकार को खबर लिखने से ज्यादा उसे बचाने की कला सीखनी पड़ रही है।” ऐसे में संगठन अगर केवल सेमिनार और ज्ञापन तक सीमित रह जाएं, तो उनकी भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रत्यायन (अक्रेडिटेशन) की नई नीतियां हों या फ्रीलांसर पत्रकारों की पहचान—ये मुद्दे आज भी अधर में लटके नजर आते हैं। भोले का सीधा सवाल है—“क्या संगठन केवल पद और प्रतिष्ठा के लिए हैं, या वास्तव में पत्रकारों की ढाल बनने के लिए?”
अंत में भोले मुस्कुराए और बोले—“वॉचडॉग बनने के लिए केवल भौंकना नहीं, कभी-कभी काटना भी पड़ता है—अन्याय को, दबाव को और उस खामोशी को, जो पत्रकारिता को खोखला कर रही है।”
अब फैसला संगठनों को करना है—उन्हें सच में प्रहरी बनना है या केवल पहरे का दिखावा करना है।
• सैन्टी गुरु























