मुरैना। मुरैना जिले का फॉरेस्ट विभाग एक बार फिर अपनी कार्यशैली को लेकर चर्चा में है। चंबल नदी से हो रहे अवैध रेत उत्खनन की चौंकाने वाली तस्वीरें सामने आई हैं, जो विभागीय लापरवाही या कथित मिलीभगत की ओर इशारा करती हैं।
जब हमारी टीम ने चंबल नदी के विभिन्न घाटों का मुआयना किया तो पाया कि सैकड़ों ट्रैक्टरों के माध्यम से अवैध रेत उत्खनन का कारोबार खुलेआम किया जा रहा है। घाटों पर ट्रैक्टरों को भरने के लिए 2 से 3 हाइड्रा मशीनें भी तैनात थीं, जो यह दर्शाता है कि यह गतिविधि किसी छुपे-छुपे तरीके से नहीं, बल्कि बेखौफ होकर की जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रत्येक घाट पर वनकर्मियों की ड्यूटी लगी हुई है, तो फिर यह अवैध उत्खनन कैसे हो रहा है? हैरानी की बात तो यह भी है कि मुरैना डीएफओ कार्यालय के बाहर तक रेत की मंडी खुलेआम लगती है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे हुए हैं।
सूत्रों के अनुसार, मुरैना डीएफओ, देवरी अधीक्षक, रेंजर रिंकी आर्य एवं गश्तीदल प्रभारी बलवीर परमार जैसे नाम सामने आ रहे हैं, जिन पर रेत माफियाओं को संरक्षण देने के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि इसके एवज में मोटी रकम इन तक पहुंचाई जाती है।
सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि एक हाइड्रा मशीन से 25 हजार से 30 हजार रुपये प्रतिमाह देवरी स्टाफ को दिए जाते हैं।
गश्तीदल प्रभारी बलवीर परमार पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। बताया जाता है कि वे अपने पूरे दलबल के साथ रातभर गश्त करते हैं, लेकिन उन्हें कोई भी रेत माफिया नजर नहीं आता। सवाल यह है कि जब उत्खनन खुलेआम चल रहा है, तो फिर गश्त के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं होती?
कुछ माह पूर्व मुरैना के कई वनकर्मियों के स्थानांतरण आदेश भी जारी हुए थे, जिनमें बलवीर परमार का नाम भी शामिल था, लेकिन आज तक इन कर्मचारियों को रिलीव नहीं किया गया। आरोप है कि ये वनकर्मी माफियाओं से वसूली कर ऊपर तक मोटी रकम पहुंचाते हैं, इसी कारण स्थानांतरण आदेशों को भी नजरअंदाज किया गया।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसे कथित रिश्वतखोर कर्मचारियों पर कोई ठोस कार्रवाई होगी, या फिर चंबल में अवैध रेत उत्खनन का यह खेल यूं ही चलता रहेगा और निर्दोष लोगों की जान खतरे में पड़ती रहेगी?
- रिपोर्ट – जिला ब्यूरो चीफ मुरैना मुहम्मद इसरार खान





