इगलास/अलीगढ़। गंगा और यमुना के बीच बसा इगलास तहसील अलीगढ़ जिले की प्रमुख तहसीलों में शुमार है। यहां बसंत पंचमी का मेला सयैद बाबा (अब्दुल्लाह शाह) की मजार से जुड़ा हुआ है। मजार नगर की सबसे ऊंची जगह पर स्थित 1850 ईस्वी में मराठों द्वारा बनवाए गए किले के पास है। पहले इसी किले में तहसील चलती थी, और मेला किले के प्रांगण, तहसील की भूमि, बाजार और मोहल्ला तकिया तक फैला रहता था – जहां झूले, नारी श्रृंगार और चूड़ियों का बाजार लगता था।
महिमा की कहानी – तहसीलदार का चमत्कार
सदियों पुरानी लोक कथा के अनुसार, मेला चल रहा था। मेले का शोर सुनकर तहसीलदार बुलंद दख्तर ने मेला बंद करा दिया। लेकिन कुछ ही देर बाद उनका स्वस्थ घोड़ा अचानक मर गया, और फिर उनका पुत्र अस्वस्थ हो गया। रात में तहसीलदार को स्वप्न आया कि सयैद बाबा की चारदीवारी बनवाकर मेला फिर से शुरू कराया जाए, तो पुत्र स्वस्थ हो जाएगा। सुबह होते ही तहसीलदार ने मजार की चारदीवारी बनवाई और मुनादी कराई कि मेला फिर से लगेगा। जैसे ही मेला शुरू हुआ, उनका पुत्र स्वस्थ हो गया। यह चमत्कार दूर-दूर तक फैल गया, और तब से लोग दूर-दराज से चादर चढ़ाने और मुराद मांगने आते हैं। तभी से बसंत पंचमी पर पहली चादर तहसीलदार द्वारा चढ़ाई जाती है – यह परंपरा आज भी जारी है।
आज की स्थिति – मजार पर रौनक गायब
गद्दी नशीन मोहम्मद शरीफ ने बताया कि जिस बाबा की महिमा से मेला लगता है, उसी मजार के आसपास अब कोई खास रौनक नहीं बची। पहले मजार के इर्द-गिर्द नारी श्रृंगार, चूड़ियां और बाजार लगता था, लेकिन अब मेला मुख्य रूप से श्री लाल बहादुर शास्त्री इंटर कॉलेज मैदान, रामलीला मैदान या अन्य जगहों पर लगता है।
- 2026 में मेला 21 जनवरी से शुरू हो चुका है और 27 जनवरी तक चलेगा।
- कार्यक्रमों में धार्मिक, सांस्कृतिक, कव्वाली और मनोरंजन शामिल हैं।
- 23 जनवरी को मजार पर चादरपोशी और कव्वाली होती है। मेला मेला क्षेत्राधिकारी और कोतवाल की निगरानी में चलता है।
इगलास में मेलों की समस्या
देश की आजादी से अब तक विधायक, सांसद मेले उद्घाटन के लिए आते रहे हैं, लेकिन इगलास में मेलों के लिए कोई स्थाई जगह नहीं बची। सरकारी जमीनें भूमाफियाओं के कब्जे में चली गईं। बसंत पंचमी मेला अब अलग-अलग मैदानों में लगता है, जबकि पहले किले और मजार के आसपास फैला रहता था।
हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक
यह मेला हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है। माँ सरस्वती के उत्सव के साथ सयैद बाबा की महिमा जुड़ी है। लोग दोनों की आस्था से जुड़कर मनाते हैं। लेकिन आज मजार पर रौनक की कमी से कई लोग चिंतित हैं – क्या पुरानी परंपरा को फिर से जीवित किया जा सकता है?
- रिपोर्ट – संजय भारद्वाज





