द्वितीय विश्व युद्ध की राख से जन्मा संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व शांति का वह महान सपना था, जिसने मानवता को युद्ध की विभीषिका से मुक्ति का वचन दिया। फिर भी आज यह संस्था स्वयं असहाय, निरीह और अप्रासंगिक होती जा रही है। युद्ध रोकना इसका मूल उद्देश्य था, किंतु शीत युद्ध की छाया में यह स्वयं लाचार रहा। न 1991 के खाड़ी युद्ध को रोक सका, न ही आज के वैश्विक संघर्षों को। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश सीनियर ने खाड़ी युद्ध के लिए संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को मात्र औपचारिक बहाना बनाया। 2003 में उनके पुत्र जॉर्ज बुश जूनियर और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने इराक व अफगानिस्तान पर आक्रमण के लिए संयुक्त राष्ट्र के कुछ प्रस्तावों का हवाला लिया, यद्यपि इराक के मामले में नया अधिकृत प्रस्ताव प्राप्त नहीं था।
1994 का रवांडा नरसंहार, जिसमें आठ लाख से अधिक निर्दोष मारे गए, संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता का काला अध्याय है। 1995 में बोस्निया के स्रेब्रेनिका में सर्ब सेना द्वारा किया गया सामूहिक हत्याकांड, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के शांतिदूत मात्र दर्शक बने रहे। 2013 से दक्षिण सूडान का गृहयुद्ध, अरब क्रांति की आड़ में लीबिया, सीरिया व अन्य क्षेत्रों में फैली हिंसा—कोई भी संकट संयुक्त राष्ट्र की सेना या कूटनीति से नहीं रुका। इन घटनाओं ने सिद्ध किया कि यह मंच राष्ट्रों के बीच संवाद का पुल नहीं, बल्कि गाली-गलौज, आरोप-प्रत्यारोप और कटु आलोचना का अखाड़ा बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली अंग—सुरक्षा परिषद—स्वयं गैर-बराबरी का प्रतीक है। पाँच स्थायी सदस्यों (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) को वीटो का अधिकार प्राप्त है। इनमें अमेरिका, रूस और चीन अक्सर नकारात्मक वीटो का प्रयोग कर संकल्पों को लंबित रखते हैं। ब्रिटेन व फ्रांस की भूमिका मध्यमार्गी है, किंतु वे भी निर्णायक हस्तक्षेप नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप ईरान पर इजरायल-अमेरिकी कार्रवाइयाँ बिना प्रभावी रोक के जारी हैं और रूस-यूक्रेन युद्ध चार वर्ष से रक्तपात की कहानी लिख रहा है। मानवाधिकार परिषद भी पक्षपात की छाया में फँसा है। कोविड-19 महामारी के दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा विकासशील देशों के प्रति दिखाई गई उपेक्षा ने संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता को और क्षीण किया।
अब जब डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका की कमान संभाली है, तब स्थिति और भी जटिल हो गई है। उन्होंने WHO सहित संयुक्त राष्ट्र के कई अंगों में आर्थिक योगदान घटाना प्रारंभ कर दिया। उनका तर्क है कि अमेरिकी करदाताओं का पैसा बेकार के मंचों पर व्यर्थ हो रहा है। ट्रंप की स्पष्टवादी शैली में औपचारिकताओं का स्थान नहीं। ईरान के विरुद्ध हालिया अमेरिकी-इजरायली कार्रवाई में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की औपचारिक स्वीकृति लेने की आवश्यकता भी नहीं समझी—जबकि अतीत में अमेरिका ऐसे कदमों को संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का पालन बताकर न्यायोचित ठहराता था।
यह असहायता अब चरम पर है। यदि विश्व के राष्ट्र इस संगठन के अस्तित्व व औचित्य पर प्रश्न उठाने लगें, तो आश्चर्य नहीं। संयुक्त राष्ट्र को पुनर्जीवित करने के लिए या तो सुरक्षा परिषद का गठन लोकतांत्रिक बनाना होगा या फिर यह संस्था इतिहास की धूल में विलीन हो जाएगी।























