आगरा। ऐतिहासिक व्यक्तित्व राणा सांगा से जुड़े कथित बयान को लेकर दायर सिविल रिवीजन अब गंभीर कानूनी और सामाजिक विमर्श का विषय बन गया है। बाबर को भारत बुलाने संबंधी टिप्पणी पर दाखिल याचिका में इतिहास की व्याख्या, संसद विशेषाधिकार और प्रतिनिधि वाद जैसे मुद्दों पर अदालत में विस्तृत बहस हुई। अपर जिला जज-19 की अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद मामले में शेष बहस के लिए 13 फरवरी की तिथि तय की है।
किस मामले में हो रही सुनवाई
अदालत में विचाराधीन सिविल रिवीजन संख्या 119/2025 — अजय प्रताप सिंह व अन्य बनाम अखिलेश यादव व अन्य में आदेश 1 नियम 8 सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत दाखिल प्रार्थना पत्र पर बहस हुई।
वादी पक्ष ने उठाए ऐतिहासिक तथ्य
वादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने अदालत में दलील दी कि ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए दौलत खान लोदी ने आमंत्रित किया था, न कि राणा सांगा ने। उनके अनुसार राणा सांगा एक महान ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं और उन पर इस प्रकार का आरोप लगाना तथ्यात्मक रूप से गलत और आपत्तिजनक है।
अधिवक्ता ने कहा कि इस प्रकार के बयान से क्षत्रिय समाज की भावनाएं आहत होती हैं। वादी स्वयं क्षत्रिय समाज से हैं, इसलिए यह मामला व्यापक सामाजिक हित से जुड़ा है और इसे प्रतिनिधि वाद के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
सांसद पक्ष ने लिया संसद विशेषाधिकार का सहारा
विपक्षी संख्या-2 रामजीलाल सुमन की ओर से उनके अधिवक्ता ने प्रार्थना पत्र का विरोध करते हुए कहा कि संबंधित बयान संसद के भीतर दिया गया था। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत सांसद को विशेषाधिकार प्राप्त है और उस पर न्यायालय में कार्यवाही नहीं हो सकती।
साथ ही यह आपत्ति भी उठाई गई कि आदेश 1 नियम 8 CPC के तहत प्रार्थना पत्र वाद दायर करते समय प्रस्तुत नहीं किया गया और वाद में भारत संघ को विपक्षी नहीं बनाया गया, जिससे वाद की पोषणीयता प्रभावित होती है।
वादी पक्ष का जवाब
वादी अधिवक्ता ने प्रत्युत्तर में कहा कि भारत संघ को पक्षकार बनाने के लिए धारा 80(2) CPC के तहत प्रार्थना पत्र पहले ही दाखिल किया जा चुका है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वाद पत्र में कहीं यह उल्लेख नहीं है कि बयान संसद के भीतर दिया गया था।
उन्होंने तर्क दिया कि वाद की पोषणीयता वाद पत्र के कथनों के आधार पर तय होती है। साथ ही कहा कि आदेश 1 नियम 8 का प्रार्थना पत्र निरस्त होने पर भी मूल वाद निजी हैसियत में जारी रह सकता है।
अब 13 फरवरी को आगे की सुनवाई
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने मामले में आगे की बहस के लिए 13 फरवरी की तारीख निर्धारित की है। मामला अब एक बयान से आगे बढ़कर इतिहास, संवैधानिक विशेषाधिकार और सामाजिक सम्मान जैसे व्यापक मुद्दों से जुड़ गया है।

