जिला नजर – एक ओर जहां बाह तहसील को जिला बनाने की लंबी लड़ी जा रही मांग जनमानस में जोर पकड़ रही है, वहीं दूसरी ओर इस प्राचीन तहसील का वर्तमान स्वरूप निराशाजनक रूप से उपेक्षित और विखंडित नजर आता है। आदि काल में दान-पुण्य की उदार भावना से बसाई गई यह तहसील, जो कभी सामाजिक समर्पण का प्रतीक थी, आज सरकारी उपक्रमों के लिए किराये के भवनों पर निर्भरता का शिकार हो चुकी है।
दानदाताओं के वंशज अब विरासती संपत्तियों को पुनः हासिल करने का अभियान चला रहे हैं, जिससे विकास की गति ठप हो रही है। स्वीकृत स्टेडियम परियोजना का क्या हाल है? वह तो मिनी स्टेडियम तक सिमट गई, मगर वह भी अधर में लटकी हुई है। यह विडंबना ही है कि जहां एक समय दान की धारा बहती थी, वहां आज संपत्ति की होड़ ने सब कुछ बाधित कर दिया है।
बाह तहसील में सरकारी विभागों की दशा सोचनीय है। अधिकांश कार्यालय किराये के निजी भवनों में सिमटे हुए हैं, जिनमें केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान भी शामिल हैं। राष्ट्रीयकृत बैंकों की बात करें तो तहसील के सभी बैंक—चाहे वे ग्रामीण बैंक हों या अन्य—निजी संपत्तियों पर किराये के अनुबंधों से बंधे हैं। डाकघरों का तो हाल और भी दयनीय है; तहसील मुख्यालय से लेकर ब्लॉक स्तर तक सभी किराये पर चलते हैं। कई जगह तो घरेलू परिसरों से ही संचालन हो रहा है। पुराने तारघर, जो कभी संचार का केंद्र थे, अब पूरी तरह निजी क्षेत्र के हवाले हो चुके हैं। डाक विभाग का दायरा बदल गया है—जब कभी चिट्ठियों के लिए होड़ लगी रहती थी, अब ई-कॉमर्स और डिजिटल सेवाओं ने उसकी जगह ले ली है, मगर भौतिक ढांचा अभी भी किराये की जकड़न में है। भूमि विकास बैंक, सहकारी बैंक, बिजली विभाग, जलकल विभाग, नहर प्रबंधन और कृषि कार्यालय के गोदाम—सभी निजी स्थानों पर आश्रित हैं। यह स्थिति न केवल वित्तीय बोझ बढ़ाती है, बल्कि सेवाओं की गुणवत्ता को भी प्रभावित करती है।
मजे की बात तो यह है कि जिन विभागों के पास अपनी जमीनें और भवन हैं, वे भी सुरक्षित नहीं। अतिक्रमणकारी भूमाफिया इन कीमती संपत्तियों पर कब्जा जमाए हुए हैं, मगर इन्हें अन्य जरूरतमंद विभागों को सौंपने का नामोनिशान नहीं। वन विभाग, जिला पंचायत, शिक्षा और स्वास्थ्य विभागों की बहुमूल्य जमीनें माफियाओं के चंगुल में फंसी हैं।
शिक्षा विभाग के स्कूल भवन तो किराये पर चल रहे हैं, जबकि उपलब्ध जमीनें बर्बाद हो रही हैं। स्वास्थ्य केंद्रों की यही दुर्दशा है। नजूल भूमि का तो हाल और भी बुरा है—वह जहां उपलब्ध है, वहां अतिक्रमण, और जहां नहीं, वहां किराया। इस संकट की गहराई तब उजागर होती है जब इन जमीनों को बचाने वाले एक साहसी पत्रकार को माफियाओं ने फर्जी मुकदमों में जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया। आश्चर्यजनक रूप से, अधिकारी उल्टे उस पत्रकार से कहते पाए गए, “तुम्हें जान का खतरा है!” यह घटना न केवल न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता को भी उजागर करती है।
याद आते हैं वे स्वर्णिम पल, जब बाह के चिंतकों ने तहसील को बसाने का महान कार्य किया। सबसे पहले चौबे मग्न लाल चतुर्वेदी और सेठ अजुध्या प्रसाद तलइया वाले थे, जिन्होंने तन-मन-धन से कार्यालयों और संस्थाओं को मजबूत आधार प्रदान किया। इनके बाद बनवारी लाल तिवारी जैसे चिंतक उभरे, जिन्होंने 1932 से 1939 के बीच स्वतंत्रता संग्राम को तहसील स्तर पर मजबूत किया। लोगों ने जमीनें दान करने की इच्छा जताई तो उन्होंने उन्हें संस्थाओं के नाम पर दर्ज कराया। एक जमीन तो उन्होंने डॉक्टर को दिलवाई, जिससे बाह में चिकित्सा सुविधाएं मजबूत हुईं और स्वास्थ्य समस्याओं पर अंकुश लगा। ये दानवीर थे, जिनकी उदारता ने बाह को आकार दिया।
आज दुर्भाग्य से वही दान-पुण्य की विरासत खतरे में है। दानदाताओं के वंशज संपत्ति वापसी की होड़ में इस कदर उतर आए हैं कि सरकारी योजनाओं का आवंटित धन भी लौटाना पड़ रहा है। विकास परियोजनाएं ठप, सेवाएं प्रभावित—यह सब राम भरोसे चल रहा है। बाह को जिला बनाने का सपना तभी साकार होगा जब प्रशासन दान की भावना को पुनर्जीवित करे, अतिक्रमण पर लगाम लगाए और विभागों को स्थायी ढांचे उपलब्ध कराए। अन्यथा, यह तहसील इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगी। समय है जागने का, वरना भविष्य की पीढ़ियां हमें क्षमा न करेंगी।























