महाराष्ट्र महिला आयोग की तत्कालीन अध्यक्ष रूपाली चाकणकर द्वारा एक बलात्कार आरोपी ज्योतिषी अशोक खरात उर्फ ‘कैप्टन’ के पैर धोने का वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर सामने आया, देशभर में आक्रोश फैल गया। यह घटना महज एक व्यक्तिगत भूल नहीं, बल्कि उन संस्थाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जो महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा के लिए बनाई गई हैं। जिस व्यक्ति पर दर्जनों महिलाओं के यौन शोषण, गुप्त कैमरों से वीडियो बनाने और अंधविश्वास के जरिए धोखा देने के आरोप हों, उसके प्रति इस प्रकार की श्रद्धा नारी सशक्तिकरण के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
मुख्यमंत्री के निर्देश पर चाकणकर का इस्तीफा इस मामले में तात्कालिक कार्रवाई जरूर है, लेकिन इससे समस्या की जड़ खत्म नहीं होती। असल सवाल यह है कि क्या महिला आयोग जैसे संवेदनशील संस्थानों में राजनीतिक नियुक्तियां उनकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता को कमजोर कर रही हैं? जब नेतृत्व ही संदिग्ध आचरण में लिप्त दिखाई दे, तो पीड़ित महिलाओं का भरोसा कैसे कायम रह सकता है?
अशोक खरात का मामला अंधविश्वास के खतरनाक रूप को उजागर करता है। पुलिस जांच में उसके फार्महाउस से आपत्तिजनक वीडियो और शोषण के प्रमाण मिले हैं। आरोप है कि वह महिलाओं को पूजा-पाठ और ज्योतिष के नाम पर अपने जाल में फंसाता, नशीले पदार्थों का उपयोग करता और उनका शोषण करता था। यह सिर्फ एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का परिणाम है, जहां अंधविश्वास और अज्ञानता अपराधियों को शक्ति प्रदान करते हैं।
भारत में अंधविश्वास का गहरा प्रभाव है, जो शिक्षा और जागरूकता के बावजूद खत्म नहीं हो पाया है। जब सार्वजनिक पदों पर बैठे लोग भी ऐसे तत्वों के प्रभाव में आ जाते हैं, तो यह स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। यह घटना दर्शाती है कि कैसे अंधविश्वास और राजनीति का गठजोड़ न्याय और नैतिकता को कमजोर करता है।
महिला आयोगों का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। बड़ी संख्या में महिलाएं आज भी हिंसा और शोषण का सामना कर रही हैं, परंतु शिकायत दर्ज कराने में हिचकिचाती हैं। इसका कारण है—संस्थाओं पर घटता विश्वास, सामाजिक दबाव और न्याय प्रक्रिया की धीमी गति।
समाधान केवल आलोचना में नहीं, बल्कि ठोस सुधारों में निहित है। महिला आयोगों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त कर उनकी स्वायत्तता सुनिश्चित करनी होगी। अंधविश्वास के खिलाफ कड़े कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है। साथ ही, समाज में जागरूकता बढ़ाने और शिक्षा के माध्यम से वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करना होगा।
रूपाली चाकणकर प्रकरण एक चेतावनी है कि यदि संस्थाओं की साख को समय रहते नहीं संभाला गया, तो महिला सुरक्षा केवल एक नारा बनकर रह जाएगी। अब समय है कि सरकार, समाज और संस्थाएं मिलकर इस गिरावट को रोकें और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाएं।























