नई दिल्ली। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) में डेटा की अखंडता पर सवाल उठाते हुए नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक हालिया रिपोर्ट ने योजना की कार्यान्वयन प्रक्रिया में व्यापक खामियों का पर्दाफाश किया है। 2015 से 2022 तक चली योजना के पहले तीन चरणों पर आधारित इस ऑडिट में पाया गया कि 95 लाख से अधिक प्रशिक्षित युवाओं के बैंक खातों की जानकारी अधूरी या गलत थी, जिसके कारण लाखों को निर्धारित पुरस्कार राशि नहीं मिल सकी। रिपोर्ट में फर्जी फोटो, दोहराए गए खाता नंबरों और बंद प्रशिक्षण केंद्रों के भुगतान जैसे मुद्दे भी सामने आए हैं।
योजना का खर्च और लक्ष्य: आंकड़ों का खेल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2015 में शुरू की गई पीएमकेवीवाई का उद्देश्य युवाओं को कौशल प्रदान कर रोजगार योग्य बनाना था। सीएजी रिपोर्ट नंबर 20 ऑफ 2025 के अनुसार, 2015-2022 के बीच योजना पर कुल 10,194 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिनमें से 9,261 करोड़ का उपयोग हुआ। लक्ष्य के मुताबिक 1.32 करोड़ युवाओं को प्रशिक्षित करने का प्लान था, लेकिन केवल 1.10 करोड़ को प्रमाणित किया गया, जिसमें पीएमकेवीवाई 2.0 और 3.0 के तहत 95.91 लाख युवा शामिल थे।
हालांकि, योजना के कार्यान्वयन में वित्तीय अनियमितताएं उजागर हुईं। उदाहरण के लिए, नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएसडीसी) ने ब्याज की 12.16 करोड़ रुपये की राशि समय पर जमा नहीं की, और प्रशासनिक खर्चों में 24.13 करोड़ का अतिरिक्त दावा किया गया। राज्यों को आवंटित 1,380.87 करोड़ में से 277.40 करोड़ का उपयोग नहीं हो सका, जो योजना की निगरानी की कमी को दर्शाता है।
डेटा की अखंडता पर बड़ा सवाल: 90 लाख के खाते ‘गायब’
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा लाभार्थियों के बैंक खातों से जुड़ा है। 95.90 लाख प्रतिभागियों में से 90.66 लाख (94.53%) के बैंक खाता विवरण शून्य, रिक्त या अमान्य पाए गए। इनमें से कई मामलों में खाता नंबर ‘11111111111’ या ‘123456’ जैसे फर्जी नंबर दर्ज थे। एक ही खाता नंबर 52,381 प्रतिभागियों के लिए दोहराया गया, जिसमें 12,122 अद्वितीय नंबरों का उपयोग हुआ—कुछ नंबर 2,000 से अधिक बार दोहराए गए। नतीजा? 34 लाख से अधिक युवाओं को 500 रुपये का पुरस्कार राशि हस्तांतरित नहीं हो सकी।
इसके अलावा, 10 लाख से अधिक प्रतिभागियों के मोबाइल नंबर या ईमेल आईडी गायब थे। रिपोर्ट में पाया गया कि एक ही ईमेल 4.44 लाख उम्मीदवारों के लिए दोहराया गया, जबकि अमान्य मोबाइल नंबरों (जैसे ‘1111111111’) का इस्तेमाल व्यापक था। लाभार्थी सर्वे में ईमेल डिलीवरी फेलियर रेट 36.51% था, जो संपर्क की कमी को रेखांकित करता है।
प्रशिक्षण केंद्रों और कंपनियों में ‘चमत्कार’: जिमों में 909 ट्रेनर प्रति केंद्र
प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर भी सवाल उठे हैं। खेल क्षेत्र के रिकग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग (आरपीएल) में 33 जिमों को शामिल किया गया, जहां औसतन 30,000 ट्रेनर नियुक्त हुए—यानी प्रति जिम 909 ट्रेनर। निरीक्षण में पाया गया कि 90 केंद्रों में से 4 बंद पाए गए, फिर भी उन्हें भुगतान किया गया।
खासतौर पर, एनएमपी नामक कंपनी ने 8 राज्यों में 33,000 युवाओं को प्रशिक्षित करने का दावा किया। लेकिन प्रमाणन के लिए एक ही फोटो को अलग-अलग राज्यों (जैसे गया, बिहार और बहराइच, उत्तर प्रदेश) के नाम से अपलोड किया गया। आश्चर्यजनक रूप से, मीडिया ट्रेनिंग के लिए उम्मीदवारों ने डॉक्टर की ड्रेस पहन रखी थी। कंपनी का पता गैर-मौजूद पाया गया, और वह रजिस्टर्ड भी नहीं थी। इसी तरह, अन्य कंपनियों जैसे रेडिएट डिजाइन्स ने 15,218 प्रमाणन गैर-मौजूद पते से किए।
प्लेसमेंट और गुणवत्ता: केवल 41% को नौकरी
56.14 लाख शॉर्ट टर्म ट्रेनिंग उम्मीदवारों में से केवल 41% (23.18 लाख) को प्लेसमेंट मिला। कई मामलों में उम्र, शिक्षा और अनुभव की अनदेखी की गई—उदाहरण के लिए, न्यूनतम 18 वर्ष की आयु वाले रोल के लिए 6.54 लाख underage उम्मीदवार प्रमाणित हुए। लाभार्थी सर्वे में 79% ने प्रशिक्षण सामग्री को असंतोषजनक बताया।
सरकार का पक्ष: सुधार की दिशा में कदम
केंद्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय ने रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पीएमकेवीवाई 4.0 में आधार-आधारित ई-केवाईसी से पंजीकरण हो रहा है, और अमान्य डेटा की समस्या कम हुई है। हालांकि, पुराने चरणों में खामियों को स्वीकार करते हुए ऑडिट के बाद 22.33 लाख रुपये की वसूली और एक एजेंसी को ब्लैकलिस्ट करने का उल्लेख किया गया।
यह रिपोर्ट योजना की पारदर्शिता और प्रभावशीलता पर बहस छेड़ने वाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल इंडिया के दौर में डेटा वेरिफिकेशन की मजबूती जरूरी है, ताकि ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ का वादा साकार हो सके।
(स्रोत: सीएजी रिपोर्ट और संबंधित प्रकाशन)

