नई दिल्ली 20 नवंबर 2025, नई दिल्ल।

देश की राजनीतिक हलचल में एक नया मोड़ आ गया है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणामों पर सवाल उठाते हुए 175 प्रमुख हस्तियों 🔹🔹ई ने विपक्षी दलों को एक खुला पत्र लिखा है। इस पत्र में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी के अलावा पूर्व आईएएस अधिकारी, न्यायाधीश, लेखक, अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। उन्होंने चुनाव परिणामों को ‘पूर्ण धोखाधड़ी’ करार देते हुए विपक्ष से अपील की है कि वह इन नतीजों को अस्वीकार कर दे और जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लोकतंत्र की रक्षा करे।

यह पत्र न केवल बिहार चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि चुनाव आयोग (ईसीआई) और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को भी कटघरे में लाता है। हस्ताक्षरकर्ताओं का कहना है कि यह प्रक्रिया संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन🙏 है और सत्ता की मनमानी का प्रतीक बनी हुई है। आइए, इस पत्र के प्रमुख बिंदुओं, आरोपों और मांगों को विस्तार से समझते हैं।

बिहार चुनाव परिणाम: ‘धोखाधड़ी का परिणाम’ या लोकतंत्र का संकट?

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे 14 नवंबर को घोषित हुए थे, जिसमें एनडीए गठबंधन ने शानदार जीत हासिल की। नीतीश कुमार के नेतृत्व में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन को भारी बहुमत मिला, जबकि महागठबंधन (आरजेडी-कांग्रेस) को करारी हार का सामना करना पड़ा। लेकिन अब यह पत्र दावा करता है कि ये परिणाम ‘चोरी के जनादेश’ हैं।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने लिखा है, “बिहार चुनाव परिणाम पूरी तरह धोखाधड़ी पर आधारित हैं। विपक्ष को इन नतीजों को स्वीकार नहीं करना चाहिए। जनता के साथ खड़े होकर संविधान की रक्षा की लड़ाई लड़नी होगी।” वे SIR प्रक्रिया को मुख्य दोषी ठहराते हैं, जो 2003 की मूल प्रक्रिया से पूरी तरह अलग है। इस प्रक्रिया में हर मतदाता को नया फॉर्म भरना पड़ता है, जिससे लाखों लोग वोटिंग से वंचित हो गए। नाम हटाने और नई सूची बनाने में कोई पारदर्शिता नहीं है, जिससे ‘भेदभावपूर्ण’ मतदाता सूची तैयार हो रही है।

पत्र में कहा गया, “यह प्रक्रिया सरकार की सत्ता-लिप्सा को पूरा करने का माध्यम बनी है। जानबूझकर मतदाताओं को हटाया जा रहा है और नए वोटर जोड़े जा रहे हैं ताकि विशिष्ट उम्मीदवार जीत सकें।” इससे बिहार में लाखों मतदाता प्रभावित हुए, जो लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों—समानता और निष्पक्षता—का उल्लंघन है।

चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप: ‘रक्षक से भक्षक’ बने?

चुनाव आयोग को पत्र में कड़ी आलोचना का शिकार बनाया गया है। हस्ताक्षरकर्ताओं का मत है कि ईसीआई अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल रहा है। “आयोग अब लोकतंत्र का रक्षक नहीं, बल्कि भक्षक बन गया है। मौजूदा नेतृत्व अवैध है और राजनीतिक प्रभाव में काम कर रहा है,” पत्र में उल्लेख है।

वे मांग करते हैं कि एक नया, निष्पक्ष, गैर-राजनीतिक और संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित चुनाव आयोग गठित किया जाए। इसके अलावा, SIR प्रक्रिया को तत्काल रोका जाए और कोई भी योग्य मतदाता सूची से बाहर न हो। पत्र में चेतावनी दी गई है कि यदि विपक्ष चुप रहा, तो 12 अन्य राज्यों में SIR लागू होने पर लोकतंत्र और खतरे में पड़ जाएगा।

विपक्ष की ‘कमजोरी’ पर सवाल: सबक लें बिहार से

विपक्षी दलों—खासकर आरजेडी और कांग्रेस—पर भी निशाना साधा गया है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा, “विपक्ष ने SIR जैसी बदली हुई प्रक्रिया में भाग लिया, जिससे धोखाधड़ी वाली सरकार को वैधता मिल गई। नागरिक संगठनों के साथ रणनीतिक सहयोग की कमी रही।” वे अपील करते हैं कि विपक्ष बिहार से सबक ले, जनता के साथ एकजुट हो और आगे आने वाले चुनावों में सक्रिय भूमिका निभाए।

“हम दर्शक, विश्लेषक और टिप्पणीकार के रूप में इस धोखाधड़ी को गहराई से देख चुके हैं। अब समय है एकजुट होकर खड़े होने का,” पत्र का समापन भावुक अपील के साथ होता है।

प्रमुख हस्ताक्षरकर्ता: विविधता का प्रतीक

यह पत्र केवल एक वर्ग का नहीं, बल्कि समाज के हर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। कुछ प्रमुख नाम:

  • जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी (सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज)
  • देवश्याम एमजी (पूर्व आईएएस अधिकारी)
  • पराकला प्रभाकर (राजनीतिक अर्थशास्त्री और लेखक)
  • जस्टिस शंकर केजी (आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व जज)
  • प्रकाश राज (फिल्म अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता)
  • माधव देशपांडे (तकनीकी और सुरक्षा सलाहकार)
  • राम शरण (जनतंत्र समाज, बिहार)
  • राशिद हुसैन (बिहार के सामाजिक कार्यकर्ता)

ये हस्तियां पत्र को एक नैतिक और बौद्धिक बल प्रदान करती हैं, जो राजनीतिक बहस को नई दिशा दे सकता है

आगे क्या? लोकतंत्र की लड़ाई का नया अध्याय

यह पत्र बिहार चुनाव के बाद राजनीतिक विमर्श को गहरा करने वाला है। विपक्ष क्या प्रतिक्रिया देगा? क्या सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई करेगा? या यह सिर्फ एक आवाज बनकर रह जाएगा? समय ही बताएगा। लेकिन एक बात साफ है—लोकतंत्र की रक्षा अब हर नागरिक की जिम्मेदारी है।

नागरिक समाज ने पहले भी चुनावी संकटों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यदि आप भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखना चाहते हैं, तो कमेंट्स में बताएं। 

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