अरे भइया, अब राजनीति में सिर्फ बयान नहीं, बॉडी लैंग्वेज भी ट्रेंड कर रही है! पहले नेता मंच से झुकते थे, अब सीधे जमीन से जुड़ रहे हैं—वो भी पूरे दंडवत स्टाइल में। लगता है कुर्सी मिलते ही गुरुत्वाकर्षण भी भावुक हो जाता है!
लोकतंत्र के इस रंगमंच पर इन दिनों एक नया नाटक खूब तालियां बटोर रहा है—नाम है “कुर्सी मिलते ही कृतज्ञता का महासागर”। जैसे ही पद की प्रसादी हाथ आई, भावनाओं का बांध ऐसा टूटा कि शब्द कम पड़ गए और जमीन ने ही सब कह दिया।
भोले सोच में पड़ गया—ये राजनीति है या कोई नया आध्यात्मिक शिविर? जहां विचारधारा नहीं, “वंदना आसन” सिखाया जा रहा है। पहले कार्यकर्ता विचारों के लिए खड़ा रहता था, अब कुर्सी के लिए लेटा दिख रहा है।
संगठन की मजबूती की बात करने वाले अब रीढ़ की लचक का प्रदर्शन कर रहे हैं। और यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब सोशल मीडिया हर दृश्य को रील बनाकर जनता के सामने परोस देता है। कोई ताली बजा रहा है, कोई मीम बना रहा है, तो कोई लोकतंत्र की नई परिभाषा लिख रहा है।
भोले को सबसे ज्यादा चुभता है यह सवाल—क्या अब राजनीति में विचारों की जगह व्यक्तियों ने ले ली है? क्या मिशन की जगह “मोह” ने कब्जा कर लिया है?
कुर्सी की चमक में आत्मसम्मान की परछाई धुंधली पड़ती दिख रही है। और भोले आखिर में बस इतना ही कहेगा—
“जहां कार्यकर्ता खड़ा नहीं रह पाता, वहां लोकतंत्र भी ज्यादा देर टिक नहीं पाता… क्योंकि जब सवाल झुक जाते हैं, तब जवाब हमेशा खड़े नहीं हो पाते!”
• *सेन्टी गुरु*























