लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच होने वाले पंचायत चुनावों से पहले योगी सरकार एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग (Dedicated OBC Commission) का गठन करेगी। यह फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका (PIL) के बाद लिया गया है, जहां सरकार ने हलफनामा देकर आयोग गठन की प्रक्रिया शुरू करने की जानकारी दी। मौजूदा पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में समाप्त हो चुका था, लेकिन इसे अक्टूबर 2026 तक बढ़ा दिया गया था। हालांकि, याचिकाकर्ता के अनुसार, वर्तमान आयोग के पास सर्वे कराने का कानूनी अधिकार नहीं था।
हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामा
योगी सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में हलफनामा देकर बताया कि चुनाव से पहले प्रदेश में एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया जाएगा। याचिका अधिवक्ता मोती लाल यादव द्वारा दायर की गई थी, जिसमें दावा किया गया कि 6 सदस्यीय समर्पित ओबीसी आयोग का प्रस्ताव राज्य मंत्रिमंडल के पास 5 महीने से अधिक समय से लंबित है। कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस अब्देश कुमार चौधरी शामिल थे, ने सरकार की प्रक्रिया की पुष्टि के बाद याचिका का निपटारा कर दिया।
रैपिड सर्वे और आरक्षण की प्रक्रिया
नई व्यवस्था के तहत समर्पित आयोग पूरे प्रदेश में पिछड़ों की संख्या और उनकी स्थिति का ‘रैपिड सर्वे’ करेगा। सर्वे रिपोर्ट आने के बाद ही पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण की सीटें तय की जाएंगी। सरकारी वकील ने हाईकोर्ट को आश्वासन दिया कि इस कदम से चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी और कानूनी रूप से मजबूत होगी। राज्य चुनाव आयोग ने भी पुष्टि की है कि अप्रैल से जुलाई 2026 तक चुनाव की तैयारियां ट्रैक पर हैं।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन
सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट गाइडलाइंस के अनुसार, किसी भी स्थानीय निकाय या पंचायत चुनाव से पहले तीन साल के कार्यकाल वाला पिछड़ा वर्ग आयोग या समर्पित कमीशन होना अनिवार्य है। इसी मानदंड को पूरा करने के लिए प्रदेश सरकार ने नया आयोग गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सरकार का मानना है कि समर्पित आयोग की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद पिछड़ा वर्ग आरक्षण को लेकर किसी तरह का भ्रम या विवाद नहीं होगा।
चुनाव में संभावित देरी और प्रभाव
पहले ओबीसी आरक्षण की स्थिति को लेकर कई कानूनी अड़चनें आई थीं, जिससे पंचायत चुनावों में देरी हुई थी। नए आयोग के गठन के बाद ऐसी समस्याओं की संभावना काफी कम हो जाएगी। इस कदम से न सिर्फ चुनाव प्रक्रिया सुचारु होगी, बल्कि पिछड़ा वर्ग की वास्तविक संख्या के आधार पर आरक्षण लागू होने से कानूनी विवादों को भी टाला जा सकेगा। प्रदेश की प्रशासनिक और चुनाव व्यवस्था अब इस रिपोर्ट के आने तक सभी निर्णयों के लिए प्रतीक्षा करेगी।

