बलिया/उत्तर प्रदेश। कल्पना कीजिए, एक ऐसा गांव जहां हर दस्तावेज, हर परिचय और हर रिश्ता एक पुरानी सजा की तरह चुभता है. जहां नाम सुनते ही लोग हंसते हैं, ताने मारते हैं और नजरें बदल जाती हैं. यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि बलिया जिले के पंदह ब्लॉक में स्थित ‘रूपवार तवायफ’ गांव की कड़वी हकीकत है. ब्रिटिश काल की एक काली छाया आज भी यहां के निवासियों को अपमानित कर रही है, और वे चीख-चीख कर नाम बदलने की गुहार लगा रहे हैं. लेकिन क्या सरकार उनकी पुकार सुन रही है?
इस गांव में करीब 800 मतदाता रहते हैं, जो बलिया मुख्यालय से महज 20 किलोमीटर दूर है. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में यह जगह उनकी अय्याशी और मनोरंजन का अड्डा बन गई थी. तवायफों से जुड़े इस इतिहास ने गांव को ‘रूपवार तवायफ’ नाम दे दिया, जो अब सदियों की सजा बन चुका है. यहां के लोग कहते हैं, “हमारा गांव बाकी गांवों जैसा ही है – खेत, घर, स्कूल और सपने. लेकिन नाम ने हमें कलंकित कर दिया.”
शर्मिंदगी की दीवार: रोजमर्रा की जिंदगी में जहर
ग्रामीणों की सबसे बड़ी पीड़ा है सामाजिक तिरस्कार. गांव के युवा रोहित यादव का दर्द छलकता है: “नौकरी के फॉर्म भरते वक्त या बाहर किसी से मिलते वक्त नाम बताना पड़ता है, तो लोग हंसते हैं. पूछते हैं, ‘कैसा नाम है ये?’ हम शर्म से पानी-पानी हो जाते हैं.” आधार कार्ड, वोटर आईडी और सरकारी कागजातों में यही नाम दर्ज है, जो हर बार अपमान का घूंट बनकर गले से उतरता है.
खासतौर पर महिलाओं और बेटियों की हालत बदतर है. गांव की महिलाएं अपनी पहचान छिपाने को मजबूर हैं. एक ग्रामीण महिला ने बताया, “बेटियों के रिश्ते आते हैं, लेकिन नाम सुनते ही रिश्तेदार पीछे हट जाते हैं. लोग बुरी नजर से देखते हैं, जैसे हमारा गांव कोई पाप का घर हो.” पंचदेव यादव सवाल उठाते हैं: “हमारी बेटियां पढ़-लिखकर आगे बढ़ना चाहती हैं, लेकिन यह नाम उनकी किस्मत पर ताला लगा रहा है.”
इतिहास का बोझ, आज की पीड़ा
गांव वाले मानते हैं कि नाम शायद पूर्वजों के समय किसी ऐतिहासिक घटना से जुड़ा होगा, लेकिन आज की पीढ़ी का इससे कोई वास्ता नहीं. बच्चे अफसर बनने के सपने देखते हैं, लेकिन नाम की वजह से सम्मान की जिंदगी दूर की कौड़ी लगती है. पूर्व प्रधान राजदेव चौधरी कहते हैं: “दुनिया बदल गई, लेकिन हमारा नाम नहीं बदला. लोग मज़ाक उड़ाते हैं, और हम चुपचाप सहते हैं.”
नाम बदलने की जंग: दो साल की गुहार, लेकिन खामोशी
ग्रामीणों की अब एक ही मांग है – गांव का नाम बदलकर ‘देवपुर’ कर दिया जाए. पिछले दो सालों से वे जिला प्रशासन से लेकर लखनऊ तक पत्र लिख रहे हैं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील कर रहे हैं. रोहित यादव पूछते हैं: “जब योगी जी बड़े-बड़े शहरों के नाम बदल रहे हैं, तो हमारे गांव की पुकार क्यों नहीं सुनते?” लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. गांव वाले कहते हैं, “हमारी आवाज दब रही है, लेकिन हम हार नहीं मानेंगे.”
यह खबर न सिर्फ एक गांव की कहानी है, बल्कि समाज की उस सोच की है जो पुराने कलंक को आज की जिंदगी पर थोप देती है. क्या ‘रूपवार तवायफ’ को ‘देवपुर’ बनने का हक मिलेगा? या यह सजा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहेगी? समय बताएगा, लेकिन ग्रामीणों की आंखों में उम्मीद और दर्द दोनों साफ नजर आते हैं.





