देवरिया। उत्तर प्रदेश में चल रहे मतदाता गहन पुनरीक्षण अभियान (SIR) के दौरान गंभीर लापरवाही का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। देवरिया जिले के अबूबकर नगर उत्तरी इलाके में एक मुस्लिम परिवार के मकान नंबर पर सात ऐसे हिंदू मतदाताओं के नाम दर्ज पाए गए हैं, जो न तो उस घर में रहते हैं और न ही आसपास के इलाके से उनका कोई वास्ता है। मामला उजागर होते ही प्रशासन हरकत में आ गया है और जिलाधिकारी दिव्या मित्तल ने इसकी जांच के आदेश दे दिए हैं।
मकान नंबर 501 बना विवाद की जड़
पीड़ित अंजुम रहमान ने बताया कि उनका मकान नंबर 501 है और उनके परिवार के सदस्य वर्षों से इसी पते पर पंजीकृत मतदाता हैं। लेकिन जब उन्होंने नई मतदाता सूची देखी, तो हैरान रह गए। सूची में उनके घर के पते पर कई ऐसे नाम दर्ज थे, जिन्हें वे न तो पहचानते हैं और न ही उन्होंने कभी अपने घर में देखा है।
मतदाता सूची के अनुसार—
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मकान नंबर 501 में विनोद मद्धेशिया और बिंदु देवी के नाम दर्ज किए गए हैं।
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वहीं 501/2 के नाम से एक अलग पता बनाकर अशोक कुमार, मणी देवी, दुर्गेश गुप्ता और आदित्य सिंह को मतदाता दर्शाया गया है।
बिना बंटवारे के कैसे बना 501/2?
अंजुम रहमान का कहना है कि उनके मकान का कभी कोई बंटवारा नहीं हुआ। ऐसे में ‘501/2’ नाम का मकान नंबर कैसे अस्तित्व में आया, यह सबसे बड़ा सवाल है। उनका दावा है कि सूची में दर्ज ये सभी नाम न तो उनके घर में रहते हैं और न ही मोहल्ले के किसी व्यक्ति ने इन्हें कभी देखा है।
2003 की सूची में नहीं थे नाम, फिर कैसे जुड़े?
SIR प्रक्रिया का आधार वर्ष 2003 की मतदाता सूची को माना गया है। नियमों के अनुसार, नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए ठोस दस्तावेज और सत्यापन अनिवार्य है। हैरानी की बात यह है कि इन सातों कथित मतदाताओं के नाम 2003 की सूची में कहीं दर्ज नहीं हैं। इसके बावजूद इन्हें अंजुम रहमान के पते से जोड़ दिया गया, जिससे बीएलओ की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
जांच के आदेश, बीएलओ पर गिर सकती है गाज
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी दिव्या मित्तल ने जांच की जिम्मेदारी ज्वाइंट मजिस्ट्रेट श्रुति शर्मा को सौंपी है।
एडीएम प्रशासन प्रेम नारायण सिंह ने बताया कि जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषी पाए जाने वाले बीएलओ और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में फर्जी तरीके से नाम जोड़ने या हटाने वालों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल
इस घटना ने मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासनिक जांच के बाद ही साफ हो पाएगा कि यह लापरवाही है या इसके पीछे कोई सुनियोजित गड़बड़ी।





