• 1857 की ज्वाला में जलकर खाक हुआ गांव, पर नहीं बुझी आज़ादी की लौ
• महुआ डाबर स्मरण दिवस: जब 5000 शहीदों ने लिखा रक्त से इतिहास
• जालियांवाला बाग पर अफसोस, महुआ डाबर पर सन्नाटा क्यों?
• सदी की सबसे बड़ी साजिश: महुआ डाबर को जलाया, और फिर मिटा दिया नक्शे से
- “जिस राख में दबा था आज़ादी का इतिहास, आज वहीं गूंज रही शहीदों की पुकार।”
- “5000 शहीदों के लहू से लिखी गई कहानी को इतिहास ने दफनाया, लेकिन महुआ डाबर की मिट्टी अब भी बोल रही है।”
- “1857 में जो गांव राख हुआ, उसकी आग अब राष्ट्रीय स्मारक की मांग बनकर धधक रही है।”
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रिपोर्ट 🔹मुकेश शर्मा
बाह/आगरा। महुआ डाबर की राख से गूंजता इतिहास: 5000 शहीदों की चीख, जो अब भी सन्नाटे को चीर रही है।
“सर इतने दिए कि सर हो गया मैदान ए वतन।
तुम पर हम फूल चढ़ाते हैं शहीदाने वतन।।”
1857 की पहली क्रांति की वह तारीख – 3 जुलाई – जब महुआ डाबर गांव को अंग्रेजों ने चारों तरफ से घेर लिया और जिंदा लोगों समेत आग के हवाले कर दिया। इतिहासकार मानते हैं कि 5,000 निर्दोष भारतीयों की चीखों ने आसमान तक को कंपा दिया। लेकिन अफसोस! इतिहास की किताबों में इस गांव का नाम तक दर्ज नहीं।
महुआ डाबर स्मरण दिवस पर आज उसी वीरगाथा को श्रद्धांजलि दी गई। डॉ. शाह आलम राना, संग्रहालय के महानिदेशक, बोले – “महुआ डाबर की राख अब भी एक राष्ट्रीय स्मारक की दरकार करती है।”

इतिहास की सबसे बड़ी साजिश:
अंग्रेजों ने न केवल गांव को जला डाला, बल्कि 50 किलोमीटर दूर ‘गौर’ में एक नया महुआ डाबर बसा कर असली सच्चाई को हमेशा के लिए दफनाने की कोशिश की।
पुरातत्व के प्रमाण:
2010 में हुई खुदाई में ईंटों की दीवारें, सिक्के और जले हुए अवशेष मिले, जो बताते हैं कि यह गांव कभी समृद्धि का केंद्र था।
एक राष्ट्रीय स्मारक की पुकार:
जैसे जालियांवाला बाग आज राष्ट्रीय स्मृति है, वैसे ही महुआ डाबर की राख भी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक चेतावनी और प्रेरणा बने।
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