उत्तर कोरिया में चुनाव एक प्रक्रिया कम, प्रदर्शन अधिक प्रतीत होता है—जहां मतपेटियां तो सजती हैं, पर विकल्पों की रोशनी अनुपस्थित रहती है। यहां मतदान अधिकार नहीं, अनिवार्यता है; और असहमति, अपराध। जनता की भूमिका केवल उपस्थित रहने और ‘हाँ’ में सिर हिलाने तक सीमित कर दी गई है। यह लोकतंत्र का वह रूप है, जिसमें प्रश्न पूछने की जगह नहीं, केवल आदेश मानने की परंपरा है।
हालिया संसदीय चुनावों ने एक बार फिर इस सच्चाई पर मुहर लगा दी है। सभी सीटों पर एकतरफा जीत, बिना विपक्ष के चुनाव और सत्ताधारी परिवार व करीबी लोगों का वर्चस्व—ये सब मिलकर उस राजनीतिक ढांचे को उजागर करते हैं, जहां सत्ता का केंद्र एक व्यक्ति और उसका दायरा बन चुका है। यहां चुनाव परिणाम नहीं बदलते, केवल औपचारिकताएं दोहराई जाती हैं।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसे भी लोकतंत्र का नाम दिया जाता है। जबकि वास्तविकता यह है कि वहां जनता की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति और विकल्प—तीनों ही सीमित कर दिए गए हैं। यही कारण है कि विश्व समुदाय में ऐसे उदाहरण चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। कुछ अन्य देशों में भी इसी प्रकार की प्रवृत्तियां सिर उठाती दिख रही हैं, जहां चुनाव तो होते हैं, पर निष्पक्षता और स्वतंत्रता सवालों के घेरे में रहती है।
उत्तर कोरिया आज वैश्विक मुख्यधारा से लगभग कटा हुआ है। न आर्थिक सहभागिता, न राजनीतिक संवाद—सिर्फ एक बंद व्यवस्था, जिसमें शासक की इच्छा ही कानून बन जाती है। यह स्थिति केवल उस देश के नागरिकों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी चुनौती है।
सवाल यह नहीं कि वहां चुनाव कब होंगे, बल्कि यह है कि वहां वास्तविक लोकतंत्र कब पहुंचेगा। जब तक जनता को चुनने, बोलने और असहमति जताने का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक हर चुनाव सिर्फ एक औपचारिकता ही रहेगा—और तानाशाही यूं ही “बल्ले-बल्ले” करती रहेगी।
✍️…. सन्त कुमार























