आगरा। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग-प्रथम ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बिजली का कनेक्शन प्राप्त करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन जीने के अधिकार का हिस्सा है।
आयोग ने विपक्षी विद्युत कंपनी ‘मैसर्स टोरेन्ट पावर लिमिटेड’ को आदेश दिया कि वह परिवादी के स्वीकृत कनेक्शन को 45 दिनों के भीतर चालू करे। खबरों के मुताबिक, परिवादी राज कुमार, जो भारतीय सेना से सेवानिवृत्त सूबेदार हैं, ने अपने मकान (लक्ष्मी स्टेट, नगला बालचन्द, आगरा) के लिए नए विद्युत कनेक्शन हेतु आवेदन किया था। उन्होंने इसके लिए आवश्यक प्रोसेसिंग फीस, सर्वे शुल्क, सिक्योरिटी डिपॉजिट और सर्विस लाइन चार्जेस (कुल ₹4,323/-) जमा किए थे, जिसके बाद उन्हें सर्विस कनेक्शन संख्या 705182382 आवंटित कर दिया गया।
हालांकि, भुगतान के बावजूद टोरेन्ट पावर ने कनेक्शन चालू करने से मना कर दिया। कंपनी का तर्क था कि जिस क्षेत्र में कनेक्शन माँगा गया है, वहां बिल्डर द्वारा विद्युतीकरण (Electrification) नहीं कराया गया है और उत्तर प्रदेश विद्युत आपूर्ति संहिता 2005 के क्लॉज 4.9 के तहत जब तक बिल्डर भारी शुल्क (लगभग ₹48 लाख से ₹58 लाख) जमा नहीं करता, तब तक व्यक्तिगत कनेक्शन नहीं दिया जा सकता।
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि शुल्क जमा करने और कनेक्शन नंबर आवंटित होने के बाद परिवादी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत ‘उपभोक्ता’ की श्रेणी में आता है। परिवादी ने साक्ष्य पेश किए कि उसके घर से मात्र 8-10 मीटर की दूरी पर बिजली का डिस्ट्रीब्यूशन बॉक्स लगा है और आसपास के घरों में पहले से ही कनेक्शन संचालित हैं।
आयोग ने माना कि जानबूझकर बिल्डर का आधार बनाकर बिजली आपूर्ति रोकना ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) है। आयोग ने दिल्ली उच्च न्यायालय के एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा, “बिजली अस्तित्व के लिए मौलिक अधिकारों में से एक है… किसी भी नागरिक से बिजली जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के बिना रहने की उम्मीद नहीं की जायेगी
आयोग ने परिवादी के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए निर्देश जारी किए कि टोरेन्ट पावर 45 दिनों के भीतर स्वीकृत कनेक्शन से बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करे। यदि कंपनी निर्धारित समय में कनेक्शन नहीं देती है, तो वह परिवादी को ₹2,00,000/- (दो लाख रुपये) मानसिक क्षतिपूर्ति के रूप में 9% वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करेगी। कंपनी को ₹10,000/- वाद व्यय के रूप में भी देने होंगे।





