लखनऊ।  उत्तर प्रदेश सरकार ने पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) प्रशांत कुमार (1990 बैच आईपीएस) को उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग (यूपीईएसएससी) का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है। यह नियुक्ति न केवल प्रशासनिक स्तर पर एक महत्वपूर्ण बदलाव है, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से केंद्र-प्रदेश संबंधों में एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखी जा रही है। रिटायरमेंट के महज छह महीने बाद मिली इस जिम्मेदारी के साथ प्रशांत कुमार को तीन वर्ष का कार्यकाल सौंपा गया है, जो आयोग के माध्यम से माध्यमिक और उच्च शिक्षा स्तर पर शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया को नई गति प्रदान करने का वादा करता है।

नियुक्ति का बैकग्राउंड: विलय और नई शुरुआत

उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2024 में उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग और माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड का विलय कर एकीकृत ‘उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग’ का गठन किया था। यह कदम शिक्षा भर्ती प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और कुशल बनाने की दिशा में उठाया गया था। आयोग के पहले अध्यक्ष प्रोफेसर कीर्ति पांडेय के हालिया इस्तीफे के बाद यह पद रिक्त हो गया था, जिसके चलते भर्ती प्रक्रिया प्रभावित हो रही थी। योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस रिक्ति को भरने के लिए प्रशांत कुमार जैसे कठोर और विश्वसनीय प्रशासक को चुना, जो यूपी पुलिस में अपने कार्यकाल के दौरान 300 से अधिक एनकाउंटरों के लिए चर्चित रहे।

प्रशांत कुमार ने मई 2025 में डीजीपी पद से सेवानिवृत्ति ली थी। उनके कार्यकाल में प्रदेश में कानून-व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई गई। बिहार मूल के इस अधिकारी को मुख्यमंत्री योगी के सबसे भरोसेमंद अफसरों में गिना जाता है। आयोग के चेयरमैन के रूप में वे प्रयागराज स्थित मुख्यालय से कार्यभार संभालेंगे, जहां शिक्षक भर्ती परीक्षाओं की निगरानी और चयन प्रक्रिया पर विशेष जोर दिया जाएगा।

केंद्र का ‘नो’ और प्रदेश का ‘यस’: राजनीतिक तनाव की झलक?

यह नियुक्ति महज एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि केंद्र-प्रदेश के बीच सत्ता संतुलन की एक रणनीतिक चाल के रूप में उभर रही है। मई 2025 में प्रशांत कुमार को डीजीपी पद पर छह माह का सेवा विस्तार देने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था, लेकिन दिल्ली ने इसे नामंजूर कर दिया। इसके बजाय, 1991 बैच के आईपीएस अधिकारी राजीव कृष्ण को नया डीजीपी नियुक्त किया गया। इसी तरह, पूर्व मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह को भी सेवा विस्तार नहीं मिला, जिन्हें हाल ही में राज्य ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया गया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि योगी सरकार ने इन ‘नामंजूर’ अधिकारियों को प्रदेश के प्रमुख संस्थानों की कमान सौंपकर केंद्र को स्पष्ट संदेश दिया है: “दिल्ली की मंजूरी के बिना भी यूपी अपने फैसले ले सकता है।” भाजपा के एक ही छत्र में केंद्र और प्रदेश होने के बावजूद यह टकराव अमित शाह के केंद्रीय नेतृत्व को एक अप्रत्यक्ष चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। एक वरिष्ठ राजनीतिक पर्यवेक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “यह नियुक्ति दर्शाती है कि योगी सरकार अब दिल्ली के इशारों पर नहीं, बल्कि स्थानीय जरूरतों और अपने विजन के आधार पर चलेगी। यूपी अब सिर्फ चुनावी मैदान नहीं, निर्णय लेने का केंद्र भी बन रहा है।”

क्या बदलेगा शिक्षा परिदृश्य?

शिक्षा सेवा चयन आयोग की कमान प्रशांत कुमार जैसे अनुभवी प्रशासक को सौंपने से भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और गति बढ़ने की उम्मीद है। पिछले वर्षों में आयोग पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे, और विलय के बाद भी प्रक्रिया में देरी की शिकायतें रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशांत कुमार का कठोर रवैया इन मुद्दों को सुलझाने में सहायक सिद्ध होगा। साथ ही, यह कदम 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले योगी सरकार की ‘शिक्षा सुधार’ एजेंडे को मजबूत करेगा।

हालांकि, राजनीतिक गलियारों में यह बहस तेज हो रही है कि क्या यह नियुक्ति केंद्र-प्रदेश के बीच बढ़ते तनाव का संकेत है? आने वाले दिनों में यह पावर बैलेंस को नई दिशा दे सकती है, जहां यूपी अपनी स्वायत्तता को और मजबूत करने की कोशिश करेगा। कुल मिलाकर, प्रशांत कुमार की यह नई भूमिका न केवल शिक्षा क्षेत्र को मजबूत करेगी, बल्कि योगी सरकार की निर्भीक छवि को भी चमकाएगी।

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