लखनऊ/प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य विवाद ने नया तूल पकड़ लिया है! मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच जुबानी जंग ने राजनीतिक और धार्मिक हलकों में तूफान मचा दिया है। यह सब माघ मेला (प्रयागराज) में हुई घटना से शुरू हुआ, जहां स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को संगम स्नान के लिए पालकी/रथ पर रोक लगाई गई और शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगा गया। अब यह विवाद यूपी विधानसभा तक पहुंच गया है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा में CM योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए शंकराचार्य पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “सनातन धर्म में शंकराचार्य का पद सर्वोच्च और पवित्र है। हर व्यक्ति शंकराचार्य नहीं लिख सकता – विद्वत परिषद द्वारा मान्यता और परंपरा से ही यह पद मिलता है।” माघ मेले में 4.5 करोड़ श्रद्धालुओं की भीड़ में भगदड़ जैसी स्थिति पैदा करने को उन्होंने मर्यादित आचरण के खिलाफ बताया और जोर दिया कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं – “मैं भी नहीं।”
इस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने शनिवार को तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा, “योगी जी कानून का पालन करने की बात करते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही उनके ऊपर दर्ज 40-45 मुकदमे हटवा लिए गए। अगर वाकई कानून मानते हैं तो उन मामलों का कोर्ट में सामना करें।” उन्होंने योगी पर “गुंडों वाली भाषा” का भी आरोप लगाया और कहा कि सनातन धर्म की बात करने वाले को ही शंकराचार्य न मानना गलत है।
समाजवादी पार्टी भी मैदान में कूद पड़ी। अखिलेश यादव ने पार्टी के पुराने सोशल मीडिया पोस्ट को रीपोस्ट किया, जिसमें गोरखनाथ मंदिर के पेज से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को “शंकराचार्य” कहा गया था। सपा ने सवाल उठाया – अगर वे शंकराचार्य नहीं, तो मंदिर के पेज पर यह सम्मान क्यों? अखिलेश ने योगी पर “योगी का सर्टिफिकेट” मांगने का व्यंग्य भी किया।
यह विवाद माघ मेले (जनवरी 2026) में मौनी अमावस्या स्नान के दौरान शुरू हुआ, जब प्रशासन ने पालकी रोककर प्रमाण मांगा। अब यह राजनीतिक रंग ले चुका है और सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है।

