लखनऊ: उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव 2026 (ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत) पर बड़ा संकट मंडरा रहा है! अप्रैल-जुलाई 2026 में होने वाले इन चुनावों में अब देरी की आशंका गहरा गई है। प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि चुनाव 2027 विधानसभा चुनाव (मार्च 2027) के साथ या उसके ठीक बाद कराए जा सकते हैं – या फिर 2027 के बाद।
योगी सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) में दाखिल हलफनामे में स्पष्ट किया है कि पंचायत चुनाव से पहले एक समर्पित पिछड़ा वर्ग (Dedicated OBC) आयोग का गठन किया जाएगा। मौजूदा आयोग का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में खत्म हो चुका था (हालांकि बढ़ाया गया, लेकिन समर्पित अधिकार नहीं)। सुप्रीम कोर्ट के ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले (वास्तविक आबादी सर्वे, आरक्षण अनुपात और 50% कैप) का पालन करने के लिए नया आयोग जरूरी है।
सरकार ने कोर्ट को बताया:
- आयोग गठन की प्रक्रिया चल रही है।
- आयोग रैपिड सर्वे करेगा (पिछड़ों की वास्तविक आबादी का आकलन)।
- सर्वे रिपोर्ट के आधार पर ही सीटों का आरक्षण तय होगा (SC/ST के लिए जनगणना 2011 के आधार पर, OBC के लिए नया डेटा)।
- कुल आरक्षण 50% से ज्यादा नहीं होगा।
यह पूरी प्रक्रिया (आयोग गठन + सर्वे + रिपोर्ट + आरक्षण सूची) में कम से कम 5-6 महीने लग सकते हैं। चुनाव की समय सीमा (जुलाई 2026 तक) निकल जाएगी, इसलिए टलना लगभग तय माना जा रहा है। हाईकोर्ट ने PIL निस्तारित कर दी, क्योंकि सरकार ने प्रक्रिया शुरू होने की पुष्टि की।
राजनीतिक रणनीति:
जानकारों का कहना है कि भाजपा सरकार पंचायत चुनावों में होने वाली स्थानीय गुटबाजी से बचना चाहती है। पंचायत स्तर पर पार्टी कार्यकर्ता ही आमने-सामने होते हैं, जो 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए चुनाव टालकर सीधे विधानसभा पर फोकस करने की रणनीति हो सकती है।
उम्मीदवारों पर असर:
हजारों संभावित प्रधान, BDC और जिला पंचायत सदस्य उम्मीदवार पिछले साल से प्रचार, सेवा कार्य और लाखों रुपये खर्च कर चुके हैं। अगर चुनाव 2027 तक खिंचे, तो उनकी रणनीति, बजट और उत्साह पर बड़ा झटका लगेगा।

