कानपुर/उत्तर प्रदेश: रात का सन्नाटा, एक मासूम बच्ची का घर से बाहर निकलना और फिर अंधेरे में छिपे शैतानों का हमला। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जो रक्षक होने चाहिए, वही भक्षक बन जाएं? कानपुर के सचेन्दी इलाके में एक 14 साल की नाबालिग लड़की को कथित तौर पर अगवा कर गैंगरेप का शिकार बनाया गया। आरोपी कोई और नहीं, बल्कि एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर अमित कुमार मौर्या और स्थानीय पत्रकार-यूट्यूबर शिवबरन यादव हैं। यह घटना न सिर्फ कानून व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि समाज की उस नींव को हिला देती है जहां वर्दी पर भरोसा और कलम पर विश्वास टूट रहा है।

बीती सोमवार की रात (जनवरी 5, 2026) का वह भयावह पल, जब पीड़िता शौच के लिए घर से बाहर निकली। तभी एक काली स्कॉर्पियो SUV में सवार दो लोग आए, बच्ची को जबरन कार में खींच लिया और सुनसान रेलवे ट्रैक के पास ले जाकर करीब दो घंटे तक उसकी इज्जत लूटते रहे। पीड़िता बेहोश हो गई, तो हैवान उसे उसी जगह फेंककर फरार हो गए। परिवार की दुनिया उजड़ गई – बच्ची की हालत गंभीर, लेकिन उसकी हिम्मत ने आरोपियों की पहचान कराई।

परिवार का संघर्ष यहीं नहीं थमा। जब वे थाने पहुंचे और बच्ची ने बताया कि एक आरोपी पुलिस वाला था, तो वहां बैठे ‘रक्षकों’ ने मानवता को तार-तार कर दिया। शिकायत दर्ज करने की बजाय, उन्हें थाने से भगा दिया गया। यह वह क्लासिक मामला है जहां सिस्टम खुद को बचाने में लगा रहता है। लेकिन न्याय की लौ बुझी नहीं – पीड़ित परिवार ने वरिष्ठ अधिकारियों से गुहार लगाई। नतीजा? थाने के SHO विक्रम सिंह को सस्पेंड कर दिया गया, DCP वेस्ट दिनेश चंद्र त्रिपाठी का ट्रांसफर हो गया। आखिरकार, मंगलवार (जनवरी 6, 2026) को FIR दर्ज हुई, लेकिन शुरू में अज्ञात आरोपियों के नाम से। बाद में जांच में शिवबरन यादव को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि अमित मौर्या फरार है। पुलिस ने चार टीमें गठित की हैं उसकी तलाश के लिए, और आरोपी की स्कॉर्पियो SUV जब्त कर ली गई है।

FIR में IPC की धाराओं के अलावा POCSO एक्ट भी जोड़ा गया है, जो इस बात की गवाही देता है कि मामला कितना संगीन है। पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “पीड़िता के बयान के आधार पर आरोपी नामजद किए गए हैं। जांच तेजी से चल रही है।” लेकिन सवाल यह है – क्या यह सिर्फ एक घटना है, या देश में फैली अराजकता का चेहरा? जहां पुलिस और मीडिया, जो समाज के चौकीदार होने चाहिए, खुद अपराध के गठजोड़ में शामिल हों, वहां न्याय की उम्मीद कहां से?

यह मामला सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है। यूजर्स पूछ रहे हैं – अगर सोशल मीडिया न होता, तो क्या 80% अपराध दर्ज भी होते? सरकार की सोशल मीडिया पर पाबंदी की कोशिशें क्या इसी लिए हैं, ताकि मुद्दे दबे रहें और मनमानी चले? संविधान तो सही है, लेकिन उसे लागू करने वाले जिम्मेदार कहां हैं? आज भी पूर्ण संविधान लागू नहीं हो पाया, और ऐसी घटनाएं इसका सबूत हैं।

पुलिस का कहना है कि जांच जारी है, और फरार आरोपी जल्द पकड़ा जाएगा। लेकिन पीड़िता और उसके परिवार के लिए न्याय की राह अभी लंबी है। क्या यह घटना एक जागृति बनेगी, या सिर्फ एक और सुर्खी? समय बताएगा, लेकिन इतना तय है – वर्दी और कलम की गरिमा दांव पर है

error: Content is protected !!
Exit mobile version