जौनपुर: एक मां की आखिरी सांस पर बेटों का क्रूर मौन… यह कहानी सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि हमारे समाज के उन घावों की याद दिलाती है, जहां मां-बाप की मेहनत के बदले उन्हें वृद्धाश्रम की ठंडी दीवारें नसीब होती हैं। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के एक वृद्धाश्रम में रह रही 68 वर्षीय शोभा देवी की अचानक मौत हो गई। पति भुआल गुप्ता ने बेटों को सूचना दी, तो जवाब आया- “घर में शादी है, अपशकुन होगा। लाश को चार दिन डीप फ्रीजर में रखवा दो, बाद में आकर चिता देंगे।” यह सुनकर बुजुर्ग पिता का दिल टूट गया। उन्होंने पत्नी की अंतिम इच्छा पूरी की और नदी किनारे शव दफना दिया। जब बेटों को पता चला, तो वे दाह संस्कार की जिद करने लगे, लेकिन पिता ने साफ कहा- “चार दिन में तो कीड़े पड़ गए होंगे।”
दर्द भरी वो रात: मौत का संदेश और बेटे का बहाना
19 नवंबर की रात को जौनपुर के प्राइवेट हॉस्पिटल में शोभा देवी ने अंतिम सांस ली। दोनों किडनी फेल होने और गंभीर इंफेक्शन के कारण उनकी हालत बिगड़ गई थी। वृद्धाश्रम के कर्मचारियों ने तुरंत भुआल गुप्ता को सूचना दी। टूटे दिल से उन्होंने सबसे छोटे बेटे को फोन किया। बेटे का जवाब सुनकर कमरा जैसे ठंडा पड़ गया: “मां की लाश अभी मत लाना। घर में बहू की शादी चल रही है। अपशकुन हो जाएगा। चार दिन फ्रीजर में रख दो, फिर आकर अंतिम संस्कार करेंगे।” यह बात सिर्फ एक फोन कॉल नहीं, बल्कि जीवन भर की त्यागमयी मां के साथ विश्वासघात थी।
भुआल गुप्ता (70) ने आंसुओं में डूबे हुए वृद्धाश्रम के सहयोगियों की मदद से पत्नी का शव गोरखपुर ले जाया। वहां नदी किनारे, शोभा देवी की अंतिम इच्छा के मुताबिक, उन्होंने शव दफना दिया। जब तीनों बेटों को यह खबर मिली, तो वे भड़क उठे- “दाह संस्कार ही करेंगे, दफनाना गलत है।” पिता का जवाब था, “अब तो देर हो चुकी। चार दिन बीत चुके, शव में कीड़े लग गए होंगे। तुम्हारी शादी की खुशी में हमारा दर्द दबा दो।”
पीछे की कड़वी सच्चाई: मेहनत की कमाई पर बेटों का ‘बोझ’ वाला तमगा
यह दर्दनाक घटना गोरखपुर के भरोईया गांव के भुआल गुप्ता और शोभा देवी की जिंदगी की सच्चाई बयां करती है। जीवन भर खेतों में मेहनत करके उन्होंने अपने छह बच्चों (तीन बेटे, तीन बेटियां) को पढ़ाया-लिखाया। बेटे नौकरी-पेशे में सफल हुए, लेकिन जैसे ही मां-बाप की उम्र बढ़ी, वे ‘बोझ’ बन गए। करीब एक साल पहले बड़े बेटे ने ही उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया। “हमने सब कुछ दिया, लेकिन बदले में क्या मिला?”- भुआल गुप्ता की यह पुकार हर उस बुजुर्ग की आवाज है, जो परिवार से अलग-थलग पड़ गया है।
वृद्धाश्रम के प्रबंधक ने बताया, “शोभा जी बहुत मिलनसार थीं। वे अक्सर बच्चों की बातें करतीं, लेकिन कभी शिकायत नहीं। मौत के बाद भी उनका चेहरा शांत था, जैसे वे जानती थीं कि अंत समय में भी अकेली रहेंगी।” यह घटना न सिर्फ एक परिवार को तोड़ रही है, बल्कि पूरे समाज को आईना दिखा रही है।
समाज का आईना: बुजुर्गों की उपेक्षा पर सवाल
भारत में वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन क्या हमारा समाज मां-बाप को भूलने का हक दे सकता है? यह घटना उन हजारों बुजुर्गों की याद दिलाती है, जो त्योहारों में भी अकेले रह जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि परिवारिक मूल्यों का क्षय और आर्थिक दबाव इसकी जड़ है। लेकिन सवाल वही है- क्या शादी की खुशी में मां का दर्द दबाना सही है? भुआल गुप्ता आज भी नदी किनारे बैठकर पत्नी को याद करते हैं। उनकी आंखों में आंसू हैं, लेकिन दिल में एक सवाल- “क्या मेरे बेटे कभी समझेंगे?”

