लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में ‘हाथी’ फिर से अपनी पुरानी चाल पर लौटने की तैयारी में है! बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अपने सबसे सफल ‘सोशल इंजीनियरिंग’ फॉर्मूले को दोबारा धार दे रही हैं। दलित-मुस्लिम गठजोड़ के असफल रहने के बाद अब उनकी नजरें ब्राह्मण वोट बैंक पर टिकी हैं। सवाल ये है – क्या 2007 की तरह ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ का नारा फिर से काम करेगा और बसपा का कमबैक होगा?
ब्राह्मणों के प्रति ‘अचानक’ बढ़ा अनुराग
पिछले कुछ महीनों में मायावती के बयान और स्टैंड ब्राह्मण समाज को केंद्र में रखकर आए हैं:
- UGC इक्विटी नियमों पर मायावती ने सवर्णों (खासकर ब्राह्मणों) के हितों की बात की और कहा कि नए नियमों से सामाजिक तनाव बढ़ा है। उन्होंने UGC पर सभी स्टेकहोल्डर्स से बात न करने का आरोप लगाया और ऊपरी जातियों के प्रतिनिधित्व की मांग की।
- हालिया विवादित वेब सीरीज ‘घूसखोर पंडत’ (Manoj Bajpayee स्टारर) पर मायावती ने तीखा हमला बोला। उन्होंने इसे ब्राह्मण समाज का अपमान बताते हुए केंद्र सरकार से तुरंत बैन की मांग की और कहा कि ‘पंडित’ को घूसखोर दिखाकर पूरे देश में ब्राह्मणों का अनादर हो रहा है। इससे ब्राह्मण समाज में रोष फैला है, और मायावती ने इसे पार्टी की ओर से कंडेम किया।
ये स्टैंड BJP और SP पर भी निशाना साधते हैं, जहां मायावती का दावा है कि दोनों पार्टियां ब्राह्मणों की अनदेखी कर रही हैं।
‘बाटी-चोखा नहीं, सम्मान चाहिए’ – मायावती का नया मंत्र
15 जनवरी 2026 को अपने 70वें जन्मदिन पर लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस में मायावती ने साफ कहा:
- ब्राह्मणों को लुभावने आयोजनों (जैसे बाटी-चोखा दावत) की नहीं, बल्कि सत्ता में वास्तविक सम्मान, प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी की जरूरत है।
- 2007-2012 बसपा सरकार में ब्राह्मणों को जो प्रतिनिधित्व मिला, वह किसी अन्य सरकार में नहीं हुआ।
- उन्होंने BJP और SP पर ब्राह्मणों की उपेक्षा का आरोप लगाया और कहा कि बसपा सत्ता में आएगी तो ब्राह्मणों, क्षत्रियों, जाटों और अन्य समुदायों के हितों का ख्याल रखेगी।
- पार्टी 2027 में अकेले लड़ेगी, कोई गठबंधन नहीं।
2007 फ्लैशबैक: जब सोशल इंजीनियरिंग ने इतिहास रचा
2007 में मायावती ने ब्राह्मण भाईचारा कमेटियां बनाईं, सतीश चंद्र मिश्रा को चेहरा बनाया। नतीजा: बसपा ने 206 सीटें जीतीं और पूर्ण बहुमत सरकार बनाई। दलितों के साथ ब्राह्मणों और अन्य सवर्णों का वोट एकजुट हुआ – ‘बहुजन’ से ‘सर्वजन’ का सफर पूरा हुआ।
मुस्लिम मोहभंग और सवर्णों की ओर वापसी
पिछले चुनावों में बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवारों पर दांव लगाया, लेकिन नतीजे जीरो रहे। मायावती का मानना है कि मुस्लिम वोट अब SP और कांग्रेस की ओर शिफ्ट हो चुके हैं। इसलिए रणनीति बदली – अब सवर्ण (खासकर ब्राह्मणों) को प्राथमिकता। उनका तर्क: सवर्णों ने ही उन्हें चार बार CM बनाया।
चुनौतियां और वर्तमान स्थिति
बसपा की हालत कमजोर है:
- विधानसभा में सिर्फ 1 विधायक (उमाशंकर सिंह)।
- लोकसभा में शून्य सांसद।
- राज्यसभा में 1 सांसद।
- ग्राउंड लेवल पर कैडर को दोबारा एक्टिवेट करना बड़ी चुनौती।
विशेषज्ञों की राय: BJP का सवर्ण आधार मजबूत है, SP का PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूला चल रहा है। बीच में बसपा के लिए जगह बनाना मुश्किल, लेकिन अगर मायावती ब्राह्मणों को ये समझा पाईं कि BJP में उनकी अनदेखी हो रही है, तो 2027 में ‘हाथी’ की चिंघाड़ फिर सुनाई दे सकती है।

