पटना, 20 नवंबर 2025 (जिला नजर)

बिहार की सियासत में एक बार फिर नीतीश कुमार का जलवा देखने को मिल रहा है। विधानसभा चुनाव 2025 में किसी सीट से उम्मीदवार न उतरने के बावजूद जनता दल (यूनाइटेड) के संरक्षक नीतीश कुमार आज दोपहर 12 बजे राजभवन में शपथ लेते हुए बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में 10वीं बार पदभार संभालेंगे। यह उपलब्धि केवल उनकी राजनीतिक चतुराई ही नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के एक महत्वपूर्ण प्रावधान की बदौलत संभव हो पा रही है। आइए जानते हैं, आखिर कैसे बिना विधायक बने भी कोई मुख्यमंत्री बन सकता है।

एनडीए की जीत के बाद नीतीश का कमबैक

बिहार विधानसभा चुनाव 6 से 11 नवंबर तक हुए थे, जिसमें एनडीए गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए बहुमत हासिल किया। चुनाव परिणामों के बाद नीतीश कुमार ने एक बार फिर एनडीए के चेहरे के रूप में कमबैक किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई केंद्रीय नेता शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होंगे। यह नीतीश का रिकॉर्ड 10वां कार्यकाल होगा, जो उन्हें बिहार के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित करता है।

नीतीश कुमार ने 2025 के विधानसभा चुनाव में किसी भी सीट से चुनाव नहीं लड़ा। वे पहले भी कई बार ऐसा कर चुके हैं। 1985 में वे विधायक बने थे, लेकिन उसके बाद उन्होंने विधान परिषद (लेगिस्लेटिव काउंसिल) का रास्ता अपनाया। वर्तमान में वे विधान परिषद के सदस्य हैं, लेकिन नई विधानसभा में उनकी सदस्यता समाप्त हो चुकी है। फिर भी, वे मुख्यमंत्री पद के लिए योग्य बने रहेंगे.

संविधान का वो ‘जादुई’ नियम: अनुच्छेद 164(4)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत, राज्यपाल किसी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकते हैं जो विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य न हो। हालांकि, इस प्रावधान की शर्त यह है कि नियुक्ति के छह महीने के अंदर व्यक्ति को विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य है। यदि ऐसा न हो, तो उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ता है।

बिहार जैसे द्विसदनीय विधानमंडल वाले राज्य में यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है। नीतीश कुमार को विधान परिषद में नामांकित किया जा सकता है, जहां राज्यपाल पांच सदस्यों को नामित करते हैं। इस तरह, वे बिना सीधे चुनाव लड़ने के मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रावधान लोकतंत्र को लचीला बनाता है, लेकिन आलोचक इसे ‘बाईपास’ रूट मानते हैं।

नीतीश कुमार ने 20 वर्षों से अधिक समय तक बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में सेवा की है, लेकिन वे कभी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ते। इसके बजाय, वे विधान परिषद का सहारा लेते हैं। 1995 से वे इसी फॉर्मूले पर चल रहे हैं।

नई सरकार का संभावित ढांचा

शपथ ग्रहण के साथ ही नई कैबिनेट का गठन होगा, जिसमें भाजपा को प्रमुख विभाग मिलने की संभावना है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार विकास, सुशासन और ‘जंगल राज’ रोकने पर फोकस करेगी। गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा था कि बिहार चुनाव “एमएलए या मंत्री बनने” के बारे में नहीं, बल्कि राज्य को मजबूत बनाने के बारे में है।

नीतीश कुमार की यह रणनीति बिहार की राजनीति में एक मिसाल बनी हुई है। क्या वे छह महीने के अंदर विधान परिषद में वापसी करेंगे? यह तो समय बताएगा, लेकिन फिलहाल, संविधान की ताकत एक बार फिर साबित हो रही है।

🔹सन्त कुमार भारद्वाज “सन्त”

"गांव से शहर तक, गलियों से सड़क तक- आपके इलाके की हर धड़कन को सुनता है "जिला नजर" न्यूज़ नेटवर्क: नजरिया सच का

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