इगलास| अलीगढ़ | संवाददाता :

नगर पंचायत अलीगढ़ इगलास में आयोजित बसंत पंचमी मेले के दौरान घटी एक घटना ने न सिर्फ मेले की रौनक पर सवाल खड़े किए, बल्कि सामाजिक सौहार्द और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर भी गंभीर बहस छेड़ दी है।

जानकारी के मुताबिक, रामलीला ग्राउंड में चल रहे रागनी कार्यक्रम के दौरान “RLD आई रे…” गीत बजाने को लेकर अनावश्यक रोक-टोक की गई। हैरानी की बात यह रही कि रागनी संयोजक द्वारा स्पष्ट रूप से गीत बजाने को कहे जाने के बावजूद कुछ अन्य लोगों ने उसे बजने नहीं दिया। यह घटनाक्रम मेले के शांतिपूर्ण और सांस्कृतिक स्वरूप के ठीक विपरीत नजर आया।

इस पूरे मामले ने इसलिए भी लोगों को चौंकाया है क्योंकि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा और RLD गठबंधन में हैं। ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है कि जब राजनीतिक स्तर पर तालमेल है, तो फिर सांस्कृतिक मंचों पर इस तरह की असहिष्णुता और रोक-टोक क्यों?

यह पहला मौका नहीं है जब ऐसा विवाद सामने आया हो। इससे पहले हाथरस में भी इसी तरह की घटना हो चुकी है और अब इगलास के बसंत पंचमी मेले में इसकी पुनरावृत्ति ने चिंताओं को और गहरा कर दिया है।

बसंत पंचमी का मेला हमारी सांस्कृतिक परंपराओं, लोककला, मनोरंजन और आपसी भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। यह वह मंच है जहाँ हर वर्ग, हर विचारधारा और हर समाज के लोगों को समान सम्मान मिलना चाहिए। ऐसे आयोजनों में किसी भी प्रकार की पक्षपातपूर्ण सोच या संकीर्ण मानसिकता के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
मौके पर मौजूद जिम्मेदार लोगों का कहना है कि हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि मेलों और सार्वजनिक आयोजनों में सद्भाव, समानता, लोकतांत्रिक मर्यादाओं और सामाजिक मूल्यों को सर्वोपरि रखा जाए, ताकि आयोजन की गरिमा बनी रहे और जनता को आनंदपूर्ण, सौहार्दपूर्ण वातावरण मिल सके।

हालांकि, इस पूरे प्रकरण में एक और गंभीर पहलू सामने आया है। बताया जा रहा है कि मेले के आयोजन को लेकर कुछ लोगों की आपत्तियों के कारण अब तक इसकी आधिकारिक अनुमति नहीं मिल पाई है। ऐसे में बिना परमिशन के चल रहे कार्यक्रमों के दौरान यदि किसी प्रकार का विवाद, टकराव या हीन भावना से प्रेरित वाद-विवाद होता है, तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी—यह सवाल अब प्रशासन और आयोजन समिति दोनों के सामने खड़ा है।


बसंत पंचमी मेले की यह घटना केवल एक गीत को लेकर हुआ विवाद नहीं, बल्कि यह समाज में बढ़ती असहिष्णुता, जिम्मेदारियों की अस्पष्टता और सांस्कृतिक आयोजनों के उद्देश्य पर पुनर्विचार की जरूरत को उजागर करती है।

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